समस्त आपदाओं से मुक्ति के लिए करें “दुर्गापदुद्धार स्तोत्र” का पाठ

समस्त आपदाओं से मुक्ति के लिए करें “दुर्गापदुद्धार स्तोत्र” का पाठ

श्री सिद्धेश्वरी तंत्र के उमामहेश्वर संवाद के अन्तर्गत् “श्री दुर्गापदुद्धार स्तोत्र” का वर्णन प्राप्त होता है | इस स्तोत्र के नौ श्लोकों में भगवती दुर्गा की स्तुति और अन्तिम के चार श्लोकों में स्तोत्र पाठ का माहात्म्य बताया गया है | जो भी मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे साक्षात् भगवती दुर्गा की अपार कृपा प्राप्त होती है |  

स्तोत्र पाठ :- 

        नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे,
                     नमस्ते जगद्वयापिके विश्वरूपे ।
        नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे,
                      नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥१॥   

शरणागतों की रक्षा तथा भक्तों पर अनुग्रह करने वाली हे शिवे ! आपको नमस्कार है | जगत् को व्याप्त करने वाली हे विश्वरुपे ! आपको नमस्कार है | हे जगत् के द्वारा वन्दित चरणकमलों वाली ! आपको नमस्कार है | जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये | 

        नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे,
                  नमस्ते महायोगिनि ज्ञानरूपे । 
        नमस्ते नमस्ते सदानन्दरूपे,
                 नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ २॥

हे जगत् के द्वारा चिन्तयमानस्वरुप वाली ! आपको नमस्कार है | हे महायोगिन ! आपको नमस्कार है | हे ज्ञानरुपे ! आपको नमस्कार है | हे सदानन्दरुपे ! आपको नमस्कार है; जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है | आप मेरी रक्षा कीजिये | 

        अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य,
              भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः ।
        त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री,
               नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ ३॥ 

हे देवी ! एकमात्र आप ही अनाथ, दीन, तृष्णा से व्यथित, भय से पीड़ित, डरे हुए तथा बन्धन में पड़े जीव को आश्रय देने वाली तथा एकमात्र आप ही उसका उद्धार करने वाली हैं | जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये | 

        अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्ये-
                 ऽनले सागरे प्रान्तरे राजगेहे।
         त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका,
                   नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥४॥ 

हे देवी ! वन में, भीषण संग्राम में, शत्रु के बीच में, अग्नि में, समुद्र में, निर्जन तथा विषम स्थानों में और शासन के समक्ष एकमात्र आप ही रक्षा करने वाली हैं, तथा संसार सागर से पार जाने के लिए नौका के समान हैं | जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये | 

       अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे,
                   विपत्सागरे मज्जतां देहभाजाम्।
       त्वमेका गतिर्देवि निस्तारहेतु-
                    र्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥५॥

हे देवी ! पाररहित, महादुस्तर तथा अत्यन्त भयावह विपत्ति सागर में डूबते हुए प्राणियों की एकमात्र आप ही शरणस्थली हैं, तथा उनके उद्धार की हेतु हैं | जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये| 

        नमश्चण्डिके चण्डदुर्दण्डलीला-
                 समुत्खण्डिताखण्डिताशेषशत्रो | 
        त्वमेका गतिर्देवि निस्तारबीजं,
                   नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ ६ ॥

अपनी प्रचण्ड तथा दुर्दण्ड लीला से सभी दुर्दम्य शत्रुओं को समूल नष्ट कर देने वाली हे चण्डिके ! आपको नमस्कार है | हे देवि ! आप ही एकमात्र आश्रय हैं, तथा भवसागर से पारगमन की बीजस्वरूपा हैं | जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये | 

        त्वमेवाघभावाधृतासत्यवादी-
                    र्न जाता जितक्रोधनात् क्रोधनिष्ठा ।
         इडा पिङ्गला त्वं सुषुम्णा च नाडी,
                      नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥७॥ 

आप ही पापियों के दुर्भावग्रस्त मन की मलिनता हटाकर सत्यनिष्ठा में तथा क्रोध पर विजय दिलाकर अक्रोध में प्रतिष्ठित होती हैं | आप ही योगियों की इडा, पिंगला, और सुषुम्णा नाडियों में प्रवाहित होती हैं | जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये | 

        नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे,
                     सरस्वत्यरुन्धत्यमोघस्वरूपे | 
        विभूतिः शची कालरात्रिः सती त्वं,
                       नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥८॥ 

हे देवी ! हे दुर्गे ! हे शिवे ! हे भीमनादे ! हे सरस्वती ! हे अरुन्धति ! हे अमोघस्वरूपे ! आप ही विभूति, शची, कालरात्रि, तथा सती हैं | जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा करें | 

        शरणमसि सुराणां सिद्धविद्याधराणां,
                      मुनिमनुजपशूनां दस्युभिस्त्रासितानाम् ।
        नृपतिगृहगतानां व्याधिभिः पीडितानां,
                       त्वमसि शरणमेका देवि दुर्गे प्रसीद ॥ ९ ॥

हे देवी ! आप देवताओं, सिद्धों, विद्याधरों, मुनियों, मनुष्यों, पशुओं तथा लुटेरों से पीड़ित जनों की शरण हैं | राजाओं के बन्दीगृह में डाले गये लोगों तथा व्याधियों से पीड़ित प्राणियों की एकमात्र शरण आप ही हैं | हे दुर्गे ! मुझपर प्रसन्न होइये | 

 स्तोत्र पाठ का महात्म्य :-

      इदं स्तोत्रं मया प्रोक्तमापदुद्धारहेतुकम् । 
      त्रिसन्ध्यमेकसन्ध्यं वा पठनाद् घोरसङ्कटात् ॥ १०॥
      मुच्यते नात्र सन्देहो भुवि स्वर्गे रसातले। 
      सर्वं वा श्लोकमेकं वा यः पठेद्भक्तिमान् सदा ॥ ११॥
      स सर्वं दुष्कृतं त्यक्त्वा, प्राप्नोति परमं पदम् ।
      पठनादस्य देवेशि, किं न सिद्धयति भूतले ॥ १२॥
      स्तवराजमिदं देवि संक्षेपात्कथितं मया ॥ १३ ॥ ।।

विपदाओं से उद्धार का हेतुस्वरूप यह स्तोत्र मैंने कहा – पृथ्वीलोक में, स्वर्गलोक में, पाताललोक में कहीं भी तीनों संध्याकालों में अथवा एक संध्याकाल में इस स्तोत्र का  पाठ करने से प्राणी घोर संकट से छूट जाता है; इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए | जो मनुष्य भक्ति परायण होकर सम्पूर्ण स्तोत्र को अथवा इसके एक श्लोक को ही पढ़ता है, वह समस्त पापों से छुटकर परमपद को प्राप्त करता है | हे देवेशि ! इसके पाठ से पृथिवीतल पर कौन-सा मनोरथ सिद्ध नहीं हो जाता ? अर्थात् सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं | हे देवी ! मैंने संक्षेप में यह स्तवराज आपसे कहा || 


“इस प्रकार श्री सिद्धेश्वरीतन्त्र के अन्तर्गत् उमामहेश्वर संवाद में श्री दुर्गापदुद्धार स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ” | 

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