व्यापार की वृद्धि तथा सर्वदा रक्षा हेतु करें हरिद्रा गणेश कवच का पाठ

व्यापार की वृद्धि तथा सर्वदा रक्षा हेतु करें हरिद्रा गणेश कवच का पाठ

।। श्री हरिद्रा गणेश कवच ।।

श्रीविश्वसार तंत्र के अन्तर्गत् श्री हरिद्रा गणेश कवच स्तोत्र प्राप्त होता है । इस स्तोत्र में कुल चौदह (14) श्लोक हैं  इन चौदह श्लोकों में से दस श्लोक में भगवान् गणेश से की रक्षा के निमित्त प्रार्थना की गयी है तथा अन्य श्लोकों में इस कवच पाठ की फलश्रुति बताई गयी है ।    

स्तोत्र पाठ के लाभ :

  • लौकिक संपत्तियों की प्राप्ति ।
  • पापों की निवृत्ति तथा शत्रुओं से रक्षा ।
  • गृह सम्बन्धी समस्याओं से मुक्ति ।
  • ज्वरादि रोगों से निवृत्ति ।
  • भूत-प्रेत आदि बाधाओं से रक्षा ।

नोट : विशेष कृपा हेतु हल्दी की गांठ से अर्चन करें ।

                 ईश्वर उवाच

शृणु वक्ष्यामि कवचं सर्वसिद्धिकरं प्रिये । 
पठित्वा पाठयित्वा च मुच्यते सर्वसङ्कटात् ॥१॥ 

ईश्वर ने [माता पार्वती से] कहा- हे प्रिये ! मैं सभी सिद्धियों को देने वाले कवच का वर्णन करता हूँ, तुम सुनो । इसके पाठ करने तथा कराने वाले के समस्त संकट दूर हो जाते हैं ।

अज्ञात्वा कवचं देवि गणेशस्य मनुं जपेत् । 
सिद्धिर्न जायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि ॥२॥ 

जो इस कवच का ज्ञान प्राप्त किये बिना ही गणेश-मन्त्र का जप करता है, उसे अनेक (करोड़ों) कल्पों में भी सिद्धि नहीं प्राप्त होती ।

ॐ आमोदश्च शिरः पातु प्रमोदश्च शिखोपरि। 
संमोदो भ्रूयुगे पातु भ्रूमध्ये च गणाधिपः ॥३॥ 

ॐ आमोद मेरे सिर की रक्षा करें, प्रमोद मूर्द्धादेश की रक्षा करें, संमोद दोनों भौहों की रक्षा करें और गणाधिप भ्रूमध्य की रक्षा करें ।

गणक्रीडो नेत्रयुगं नासायां गणनायकः । 
गणक्रीडान्वितः पातु वदने सर्वसिद्धये ॥४॥ 

गणक्रीड दोनों नेत्रों की, गणनायक नासिका की, गणक्रीडान्वित मुखमण्डल की रक्षा करें, जिससे मुझे सर्वसिद्धि प्राप्त हो सके ।

जिह्वायां सुमुखः पातु ग्रीवायां दुर्मुखः सदा । 
विघ्नेशो हृदये पातु विघ्ननाथश्च वक्षसि ॥५॥

सुमुख मेरी जीभ की, दुर्मुख ग्रीवा की, विघ्नेश हृदय की और विघ्ननाथ वक्षःस्थल की सदा रक्षा करें ।

गणानां नायकः पातु बाहुयुग्मं सदा मम। 
विघ्नकर्ता च ह्युदरे विघ्नहर्ता च लिङ्गके ॥६॥ 

गणनायक मेरी दोनों भुजाओं की सदा रक्षा करें, विघ्नकर्ता मेरे उदर की और विघ्नहर्ता मेरे लिंग की रक्षा करें ।

गजवक्त्रः कटीदेशे एकदन्तो नितम्बके । 
लम्बोदरः सदा पातु गुह्यदेशे ममारुणः ॥७॥ 

गजवक्त्र कटिप्रदेश की, एकदन्त नितम्ब की तथा लम्बोदर और अरुण मेरे गुप्तांगों की सदा रक्षा करें । 

व्यालयज्ञोपवीती मां पातु पादयुगे सदा। 
जापकः सर्वदा पातु जानुजङ्घ गणाधिपः ॥८॥ 

व्यालयज्ञोपवीती मेरे दोनों पैरों की तथा जापक और गणाधिप मेरे घुटनों और जंघों की रक्षा करें ।

हरिद्रः सर्वदा पातु सर्वाङ्गे गणनायकः । 
य इदं प्रपठेन्नित्यं गणेशस्य महेश्वरि ॥९॥ 

कवचं सर्वसिद्धाख्यं सर्वविघ्नविनाशनम् । 
सर्वसिद्धिकरं साक्षात्सर्वपापविमोचनम् ॥१०॥

गणनायक हरिद्रागणपति मेरे सर्वांगों की सदा रक्षा करें । हे महेश्वरि ! यह सर्वसिद्ध नामक कवच सभी विघ्नों का नाशक और सर्वसिद्धिदायक है । जो इसका नित्य पाठ करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

सर्वसम्पत्प्रदं साक्षात्सर्वपापविमोक्षणम् । 
सर्वसम्पत्प्रदं साक्षात्सर्वशत्रुक्षयङ्करम् ॥११॥

यह कवच सभी सम्पत्तियों को प्रदान करने वाला, सभी पापों से मुक्त करने वाला और सभी शत्रुओं का नाश करने वाला है ।

ग्रहपीडा ज्वरा रोगा ये चान्ये गुह्यकादयः । 
पठनाद्धारणादेव नाशमायान्ति तत्क्षणात् ॥१२॥

ग्रह-पीडा, ज्वरादि रोग और अन्य प्रेत-पिशाचादि सम्बन्धी कष्ट इसके पाठ और धारण करने से तत्क्षण दूर हो जाते हैं ।

धनधान्यकरं देवि कवचं सुरपूजितम्। 
समं नास्ति महेशानि त्रैलोक्ये कवचस्य च ॥१३॥ 

हारिद्रस्य महेशानि कवचस्य च भूतले । 
किमन्यैरसदालापैर्यत्रायुर्व्ययतामियात् ॥१४॥

हे देवि ! यह कवच देवताओं द्वारा पूजित और धनधान्य को प्रदान करने वाला है । हे महेश्वरि ! इस हरिद्रागणपतिकवच के समान [प्रभावकारी] इस धरातल पर अथवा त्रिलोकी में अन्य कुछ भी नहीं है । अतः अन्य असत् वार्ता में आयु नष्ट करने से क्या लाभ है ? 

॥ इति श्रीविश्वसारतन्त्रे श्रीहरिद्रागणेशकवचं सम्पूर्णम् ॥

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