चतु:पुरुषार्थ प्राप्ति कराने वाला पद्मपुराणोक्त श्री गणपति वन्दना

चतु:पुरुषार्थ प्राप्ति कराने वाला पद्मपुराणोक्त श्री गणपति वन्दना

।। श्री गणपति वन्दना ।।

यह गणपति वन्दना श्रीपद्मपुराण के सृष्टिखण्ड में महर्षि वेदव्यासजी द्वारा की गयी है । इस गणपति स्तवन में भगवान् गणपति के स्वरुप का चार श्लोकों में विशिष्ट वर्णन किया गया है जो चतु:पुरुषार्थ का प्रदायक है।   

एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम् ।
लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम् ॥१॥

मैं विशालकाय, तपाये हुए स्वर्ण-सदृश प्रकाश वाले, लम्बोदर, बड़ी-बड़ी आँखों वाले श्रीएकदन्त गणनायक की वन्दना करता हूँ ।

मुञ्जकृष्णाजिनधरं नागयज्ञोपवीतिनम् ।
बालेन्दुकलिकामौलिं वन्देऽहं गणनायकम् ॥२॥

जिन्होंने मौंजीमेखला, कृष्ण-मृगचर्म तथा नाग-यज्ञोपवीत धारण कर रखे हैं, जिनके मौलिदेश में बालचन्द्र सुशोभित हो रहा है, मैं उन गणनायक की वन्दना करता हूँ ।

चित्ररत्नविचित्राङ्गं चित्रमालाविभूषणम् ।
कामरूपधरं देवं  वन्देऽहं  गणनायकम् ॥३॥

जिन्होंने अपने शरीर को विविध रत्नों से अलंकृत किया है, अद्भुत माला धारण की है, जो स्वेच्छा से अनेक रूपों में अभिव्यक्त होते हैं, उन गणनायक की मैं वन्दना करता हूँ ।

गजवक्त्रं सुरश्रेष्ठं चारुकर्णविभूषितम् ।
पाशाङ्कुशधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ४॥

जिनका मुख हाथी के मुख के समान है, जो सर्वदेवों में श्रेष्ठ हैं, सुन्दर कानों से विभूषित हैं, उन पाश और अंकुश धारण करने वाले श्रीगणपतिदेव की मैं वन्दना करता हूँ ।

॥ इति श्रीपद्मपुराणे सृष्टिखण्डे महर्षिव्यासकृता श्रीगणपतिवन्दना सम्पूर्णा ॥

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