नारायण कवच

श्री नारायण कवच पाठ एवं हवन

कथा | Duration : 4 Hrs 30 Min
Price Range: 5100 to 11000

About Puja

             महर्षि वेदव्यास कृत यह कवच श्रीमद्भागवत् पुराणान्तर्गत् षष्ठ स्कन्ध के आठवें अध्याय में वर्णित है। एक समय देवराज इन्द्र, इन्द्राणी के साथ सभा में विराजमान थे। उसी समय देवगुरु बृहस्पति का पदार्पण सभा में होता है, किन्तु इन्द्र ने ऐश्वर्य के मद से सदाचार का उल्लंघन करते हुए देवगुरु का सत्कार नहीं किया, अतएव सुरासुर नमस्कृत देवगुरु सहसा इन्द्र की सभा से निकलकर अपने निवास स्थान को चले जाते हैं, उस समय इन्द्र को यह बोध होता है कि मैने गुरु का तिरस्कार किया है और इन्द्र अपने इस व्यवहार की स्वयं निन्दा करते हुए अपने को आसुरी वृत्ति से युक्त समझते हैं। गुरु का अनादर करने वाला निश्चय ही सभी प्रकार के कल्याण से हीन हो जाता है। इन्द्र देवगुरु को प्रसन्न करने के लिए उनके आश्रम पर जाते हैं, किन्तु बृहस्पति अध्यात्म माया के बल से अदृश्य हो जाते हैं तथा इन्द्र की विकलता और बढ़ जाती है।

             देवराज को गुरुकृपा से वंचित समझकर छिद्रानवेशी आततायी असुर शुक्रचार्य कि आज्ञा से देवों पर आक्रमण कर देते हैं, दैत्यों के प्रहार से छिन्नभिन्न अङ्गो वाले देवगण ब्रह्मा जी के शरण में जाते हैं और ब्रह्म जीसे प्रार्थना करते हैं, कि दैत्यों के द्वारा हमारी राज्यलक्ष्मी का अपहरण कर लिया गया है और हम महान् सङ्कट में हैं, तब ब्रह्मा जी देवताओं से कहते हैं कि, यह गुरु की अवहेलना का ही परिणाम है, तुम सभी देवगण त्वाष्ट्र विश्वरूप से प्रार्थना करो जो महान् तपस्वी हैं। वही सम्मानित होकर तुम्हारी कार्य सिद्धि करेंगे, देवता विश्वरूप से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि आचार्य ब्रह्मस्वरूप होते हैं तथा पिता को प्रजापति का स्वरूप कहा जाता है, भ्राता मरुत्पति तथा माता साक्षात् पृथ्वी स्वरूपिणी होती है इसीलिए हे प्रभो ! आप अपने तपोबल से शत्रुओं द्वारा हुई पराभव जन्य पीड़ा को दूर करने में समर्थ हैं।

            आपको हम उपाध्याय रूप में वरण करते हैं। आप ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, आप ही के तेज से सुगमता पूर्वक शत्रुओं को जीतने में हम सक्षम हो सकेंगे। महातपस्वी विश्वरूप ने देवताओं की अभ्यर्थना को स्वीकार कर पौरोहित्य कर्म को ग्रहण किया। विश्वरुप के द्वारा उपदिष्ट और प्रायोजित वैष्णवी विद्या का अवलम्बन कर शुक्रचार्य के द्वारा अभिरक्षित दैत्यों की सम्पदा को बल पूर्वक छीनकर देवराज इन्द्र को समर्पित किया। यही वैष्णवी विद्या श्रीनारायण कवच के नाम से प्रसिद्ध है। कवच का प्रयोग आत्मरक्षा हेतु किया जाता है और आत्मरक्षा के द्वारा ही अभिलषित वस्तु की प्राप्ति सम्भव है, इसी नारायण कवच के प्रयोग से देवताओं ने अपनी सम्पदा को पुनः प्राप्त किया।

   

   

Benefits

श्री नारायण कवच पाठ एवं हवन का माहात्म्य:-

  • यह कवच समग्र आपदाओं से रक्षा करने वाला अमोघ अस्त्र है। 
  • उदारमती विश्वरूप के द्वारा देवराज इन्द्र को दिया गया यह नारायण कवच है इसी के बल पर सहस्राक्ष इन्द्र ने आसुरी सेना पर विजय प्राप्त की।
  • समस्त अङ्गो एवं अभीष्ट पदार्थों की रक्षा करने वाला यह महान कवच है।
  • इस कवच को धारण करने वाला सभी कालों में विजयी होता है। जिस प्रकार युगान्त कालीन अग्नि के समान तीक्ष्ण चक्र जो कि भगवान् के द्वारा प्रयोग किया जाता है,वह समग्र शत्रुसमूह को  ठीक उसी प्रकार भस्म कर देता है जैसे वायु का सखा अग्नि शुष्क तृणपुञ्ज को भस्म कर देता है।
  • यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, यातुधान तथा ग्रहों की क्रूर दृष्टि को शीघ्र ही नष्ट करने वाला यह अद्भुत कवच है।
  • जैसे भगवान् कृष्ण के द्वारा बजाया गया पाञ्चजन्य शङ्ख शत्रुओं के हृदय में कम्पन उत्पन्न कर देता है तद् वत् इस कवच के प्रभाव से शत्रुओं के हृदय विदीर्ण हो जाते हैं।
  • कल्याण के बाधक समग्र तत्व इस कवच के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं । 
  • इस कवच को धारण करने वाला  अपनी दृष्टि से जिसको देखता है, वह शीघ्र ही विपद् समूहों से विमुक्त हो जाता है।
  • कवच पाठ के प्रभाव से खोई हुई लक्ष्मी या किसी कारण वश अवरुद्ध धन इस दिव्य कवच की कृपा से प्राप्त हो जाता है।
Process

श्री नारायण कवच पाठ एवं हवन प्रयोग या विधि:

  1. स्वस्तिवाचन एवं शान्तिपाठ
  2. प्रतिज्ञा सङ्कल्प
  3. गणपति गौरी पूजन
  4. कलश स्थापन एवं वरुणादि देवताओं का पूजन
  5. पुण्याहवाचन एवं मन्त्रोच्चारण अभिषेक
  6. षोडशमातृका पूजन
  7. सप्तघृतमातृका पूजन
  8. आयुष्यमन्त्रपाठ
  9. नवग्रह मण्डल पूजन
  10. अधिदेवता, प्रत्यधिदेवता आवाहन एवं पूजन
  11. पञ्चलोकपाल,दशदिक्पाल, वास्तु पुरुष आवाहन एवं  पूजन 
  12. रक्षाविधान 
  13. प्रधान देवता पूजन
  14. पाठ विधान
  15. विनियोग
  16. करन्यास
  17. हृदयादिन्यास
  18. ध्यानम्
  19. स्तोत्र पाठ
  20. पंचभूसंस्कार, अग्नि स्थापन, ब्रह्मा वरण, कुशकण्डिका
  21. आधार-आज्यभागसंज्ञक हवन
  22. घृताहुति, मूलमन्त्र आहुति, चरुहोम
  23. भूरादि नौ आहुति स्विष्टकृत आहुति, पवित्रप्रतिपत्ति
  24. संस्रवप्राशन, मार्जन, पूर्णपात्र दान
  25. प्रणीता विमोक, मार्जन, बर्हिहोम 
  26. पूर्णाहुति, आरती, विसर्जन
Puja Samagri

वैकुण्ठ के द्वारा दी जाने वाली पूजन सामग्री:-

  • रोली, कलावा    
  • सिन्दूर, लवङ्ग 
  • इलाइची, सुपारी 
  • हल्दी, अबीर 
  • गुलाल, अभ्रक 
  • गङ्गाजल, गुलाबजल 
  • इत्र, शहद 
  • धूपबत्ती,रुईबत्ती, रुई 
  • यज्ञोपवीत, पीला सरसों 
  • देशी घी, कपूर 
  • माचिस, जौ 
  • दोना बड़ा साइज,पञ्चमेवा 
  • सफेद चन्दन, लाल चन्दन 
  • अष्टगन्ध चन्दन, गरी गोला 
  • चावल(छोटा वाला), दीपक मिट्टी का 
  • सप्तमृत्तिका 
  • सप्तधान्य, सर्वोषधि 
  • पञ्चरत्न, मिश्री 
  • पीला कपड़ा सूती

हवन सामग्री एवं यज्ञपात्र :-

  • काला तिल 
  • चावल 
  • कमलगट्टा
  • हवन सामग्री, घी,गुग्गुल
  • गुड़ (बूरा या शक्कर) 
  • बलिदान हेतु पापड़
  • काला उडद 
  • पूर्णपात्र -कटोरी या भगोनी
  • प्रोक्षणी, प्रणीता, स्रुवा, शुचि, स्फय - एक सेट
  • हवन कुण्ड ताम्र का 10/10  इंच या 12/12 इंच 
  • पिसा हुआ चन्दन 
  • नवग्रह समिधा
  • हवन समिधा 
  • घृत पात्र
  • कुशा
  • पंच पात्र

यजमान के द्वारा की जाने वाली व्यवस्था:-

  • वेदी निर्माण के लिए चौकी 2/2 का - 1
  • गाय का दूध - 100ML
  • दही - 50ML
  • मिष्ठान्न आवश्यकतानुसार 
  • फल विभिन्न प्रकार ( आवश्यकतानुसार )
  • दूर्वादल (घास ) - 1मुठ 
  • पान का पत्ता - 07
  • पुष्प विभिन्न प्रकार - 2 kg
  • पुष्पमाला - 7 ( विभिन्न प्रकार का)
  • आम का पल्लव - 2
  • विल्वपत्र - 21
  • तुलसी पत्र -7
  • शमी पत्र एवं पुष्प 
  • तांबा या पीतल का कलश ढक्कन सहित
  • थाली - 2 , कटोरी - 5 ,लोटा - 2 , चम्मच - 2 आदि 
  • अखण्ड दीपक -1
  • पानी वाला नारियल
  • देवताओं के लिए वस्त्र -  गमछा , धोती  आदि 
  • बैठने हेतु दरी,चादर,आसन 
  • गोदुग्ध,गोदधि

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