बल,बुद्धि तथा अभीष्ट की सिद्धि प्राप्ति के लिए करें मन्त्रगर्भ गणपति स्तोत्र का पाठ

बल,बुद्धि तथा अभीष्ट की सिद्धि प्राप्ति के लिए करें मन्त्रगर्भ गणपति स्तोत्र का पाठ

।। मन्त्रगर्भ श्री गणपति स्तोत्रम् ।। 

श्रीवासुदेवानन्दसरस्वती द्वारा विरचित इस स्तोत्र में बारह (12) श्लोक हैं । इस स्तोत्र में भगवान् गणेश से बल,बुद्धि तथा अभीष्ट की सिद्धि के निमित्त प्रार्थना की गयी है । 

नमो गणपते तुभ्यं ज्येष्ठज्येष्ठाय ते नमः ।
स्मरणाद्यस्य ते विघ्ना न तिष्ठन्ति कदाचन ॥१॥ 

हे गणपति ! आपको प्रणाम है, ज्येष्ठों में भी ज्येष्ठ आपको नमस्कार है, आपके स्मरणमात्र से (शुभ कार्य में) विघ्न-बाधाएँ कभी भी नहीं टिक पातीं ।

देवानां चापि देवस्त्वं ज्येष्ठराज इति श्रुतः। 
त्यक्त्वा त्वामिह कः कार्यसिद्धिं जन्तुर्गमिष्यति ॥२॥

आप देवताओं के भी देवता हैं, आप ज्येष्ठराज (राजराजेश्वर) - इस नाम से प्रसिद्ध हैं। आपसे विमुख हुआ कौन प्राणी अपने कार्य में सफल हो सकता है ? 

स सत्वं गणपतिः प्रीतो भव ब्रह्मादिपूजितः ।
चरणस्मरणात्तेऽपि स्युर्ब्रह्माद्या यशस्विनः ॥३॥

ब्रह्मादि देवश्रेष्ठों से पूजित आप गणपति (हम पर) प्रसन्न हों । आपके चरणों का (श्रद्धापूर्वक) स्मरण करने से ही ब्रह्मादि देवगण यशस्वी हुए हैं ।

परापरब्रह्मदाता सुराणां त्वं सुरो यतः । 
सन्मतिं देहि मे ब्रह्मपते ब्रह्मसमीडित ॥४॥ 

आप देवताओं के देवता और श्रेष्ठतम ब्रह्मज्ञान देने वाले हैं। हे ब्रह्मपते ! आप ब्रह्मादि देवों से पूजित हैं। आप मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें ।

उक्तं हस्तिमुखश्रुत्या त्वं ब्रह्म परमित्यपि ।
कृतं वाहनमाखुस्ते कारणं त्वत्र वेद नो ॥५॥

वेदों के द्वारा आप हाथी के मुखवाले कहे गये हैं, फिर भी आप परब्रह्म हैं। आपने चूहे को अपना वाहन बना रखा है-हम इसका कारण नहीं जान पाते ।

इयं महेश ते लीला न पस्पर्श यतो मतिः । 
त्वां न हेरम्ब कुत्रापि परतन्त्रत्वमीश ते ॥६॥

हे महेश ! यह आपकी लीला है, जिसे हमारी बुद्धि नहीं छू पाती । हे परमेश्वर ! हे हेरम्ब! आपको किसी भी प्रकार की परतन्त्रता नहीं है, आप सर्वसमर्थ हैं ।

स त्वं कवीनां च कविर्देव आद्यो गणेश्वरः।
अरविन्दाक्ष विद्येश प्रसन्नः प्रार्थनां शृणु ॥७॥

आप कवियों (ऋषियों) के कवि हैं, आप आदिदेव गणनायक हैं,आप कमलनेत्र और विद्या के भण्डार हैं। आप प्रसन्न हों और हमारी प्रार्थना स्वीकार करें ।

त्वमेकदन्त विघ्नेश देव श्रृण्वर्भकोक्तिवत् ।
सत्कवीनां मध्य एव नैकाण्वंशकविं कुरु ॥८॥

हे एकदन्त ! विघ्नेश ! हे देव ! आप बालक के (अटपटे) वचनों की तरह मेरी प्रार्थना सुनें । सत्कवियों के बीच मुझे अधम कवि न बनायें ।

श्रीविनायक ते दृष्ट्या कोऽपि नूनं भवेत् कविः ।
तं त्वामुमासुतं नौमि सन्मतिप्रद कामद ॥९॥

श्रीविनायक ! आपकी कृपादृष्टि से कोई भी निश्चय ही कवि बन सकता है। मैं उन्हीं सन्मति देने और कामनाओं को पूर्ण करने वाले उमासुत आपको प्रणाम करता हूँ ।

ममापराधः क्षन्तव्यो नतिभिः संप्रसीद मे ।
न नमस्याविधिं जाने त्वं प्रसीदाद्य केवलम् ॥१०॥

मेरे अपराध क्षमा करें और मेरी प्रार्थना से प्रसन्न हों । मुझे नमस्कार की विधि नहीं मालूम, हे आद्य ! आप मुझ पर कृपा करें ।

न मे श्रद्धा न मे भक्तिर्न त्वदर्चनपद्धतिः ।
ज्ञात्वा वदान्यस्तेऽस्मीति ब्रूवे साधनवर्जितः ॥११॥

मुझमें न श्रद्धा है, न भक्ति है, न आपकी पूजापद्धति का ही मुझे ज्ञान है। मैं साधनहीन आपकी कृपा का सहारा जानकर प्रार्थना कर रहा हूँ ।

कर्तुं स्तवं च तेऽनीशः प्रसीद कृपयोद्धर ।
प्रणामं कुर्वतोऽनेन सदानन्द प्रसीद मे ॥१२॥

आपकी स्तुति करने की भी सामर्थ्य मुझमें नहीं है। आप प्रसन्न हों और कृपापूर्वक मेरा उद्धार करें। हे आनन्दस्वरूप ! इस स्तुति के द्वारा प्रणाम करते हुए मुझ पर आप प्रसन्न हों ।

॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीकृतं मन्त्रगर्भगणपतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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