पुरुषार्थ चतुष्ट्य एवं सुहाग की रक्षा के निमित्त करें महाभागवत पुराण में वर्णित माता पार्वती की यह स्तुति

पुरुषार्थ चतुष्ट्य एवं सुहाग की रक्षा के निमित्त करें महाभागवत पुराण में वर्णित माता पार्वती की यह स्तुति

श्री महाभागवत पुराण के अन्तर्गत ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा देवी पार्वती की स्तुति चार श्लोकों में की गयी है |  माता पार्वती के इस स्तुति पाठ को करने से सुहागन स्त्रियों के सुहाग की रक्षा होती है , एवम् अविवाहित कन्याओं को इस स्तुति का पाठ करने से मनोवांछित सुन्दर, योग्य वर की प्राप्ति होती है | ये चारों श्लोक मनुष्यों को पुरुषार्थ चतुष्ट्य ( धर्म, अर्थ,काम,मोक्ष ) की प्राप्ति कराने वाले हैं |

     त्वं माता जगतां पितापि च हरः सर्वे इमे बालका- 
                 स्तस्मात्त्वच्छिशुभावतः सुरगणे नास्त्येव ते सम्भ्रमः ।  
     मातस्त्वं शिवसुन्दरि त्रिजगतां लज्जास्वरूपा यत- 
                  स्तस्मात्त्वं जय देवि रक्ष धरणीं गौरि प्रसीदस्व नः ॥ १॥

ब्रह्मा आदि देवताओं ने कहा – माता ! शिवसुन्दरी ! आप तीनों लोकों की माता हैं, और शिवजी पिता हैं, तथा ये सभी देवतागण आपके बालक हैं | अपने को आपका शिशु मानने के कारण देवताओं को आपसे कोई भय नहीं है | देवि ! आपकी जय हो | गौरि ! आप तीनों लोकों में लज्जारूप से व्याप्त हैं, अतः पृथ्वी की रक्षा करें और हम लोगों पर प्रसन्न हों | 

     त्वमात्मा त्वं ब्रह्म त्रिगुणरहितं विश्वजननि,
                  स्वयं भूत्वा योषित्पुरुषविषयाहो जगति च। 
     करोष्येवं क्रीडां स्वगुणवशतस्ते च जननीं,
                  वदन्ति त्वां लोकाः स्मरहरवरस्वामिरमणीम् ॥ २॥ 

विश्वजननी ! आप सर्वात्मा हैं, और आप तीनों गुणों से रहित ब्रह्म हैं | अहो, अपने गुणों के वशीभूत होकर आप ही स्त्री तथा पुरुष का स्वरुप धारण करके संसार में इस प्रकार की क्रीडा करती हैं, और लोग आप जगत् जननी को कामदेव के विनाशक परमेश्वर शिव की रमणी कहते हैं | 

     त्वं स्वेच्छावशतः कदा प्रतिभवस्यंशेन शम्भुः पुमा- 
              न्स्त्रीरूपेण शिवे स्वयं विहरसि त्रैलोक्यसम्मोहिनि । 
     सैव त्वं निजलीलया प्रतिभवन् कृष्णः कदाचित्पुमान्,
             शम्भुं सम्परिकल्प्य चात्ममहिषीं राधां रमस्यम्बिके ॥ ३॥   

तीनों लोकों को सम्मोहित करने वाली शिवे ! आप अपनी इच्छा के अनुसार अपने अंश से कभी पुरुषरूप में शिव सदृश हो जाती हैं, और स्वयं स्त्री रूप में विद्यमान रहकर उनके साथ विहार करती हैं | अम्बिके ! वे ही आप अपनी लीला से कभी पुरुषरूप में कृष्ण का रूप धारण कर लेती हैं, और उनमें शिव की परिभावना कर स्वयं कृष्ण की पटरानी राधा बनकर उनके साथ रमण करती हैं | 

     प्रसीद मातर्देवेशि जगद्रक्षणकारिणि ।
     विरम त्वमिदानीं तु धरणीरक्षणाय वै॥४॥ 

जगत् की रक्षा करने वाली देवेश्वरि ! माता ! प्रसन्न होइये और पृथ्वी की रक्षा के लिये अब इस लीलाविलास से विरत हो जाइये | 

“इस प्रकार श्रीमहाभागवत पुराण में ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा की गयी पार्वती स्तुति सम्पूर्ण हुई” | 

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