अचल लक्ष्मी प्राप्ति हेतु करें इन्द्रकृत श्रीमहालक्ष्मी-अष्टक का पाठ

अचल लक्ष्मी प्राप्ति हेतु करें इन्द्रकृत श्रीमहालक्ष्मी-अष्टक का पाठ

देवराज इन्द्र द्वारा विरचित माता लक्ष्मी को समर्पित यह स्तोत्र है । श्री महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र में कुल ग्यारह स्तोत्र हैं जिनमें भगवती महालक्ष्मी को अत्यन्त विनय और श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया गया है । माता महालक्ष्मी साधक को समस्त प्रकार भौतिक वस्तुएं प्रदान करती हैं । जो मनुष्य प्रतिदिन एक समय पाठ करता है उसके समस्त बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है तथा जो प्रतिदिन दोनों समय पाठ करता है उसे समस्त धन-धान्य की प्राप्ति होती है और जो साधक प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करता है उसको समस्त सिद्धियाँ एवं राजवैभव माता लक्ष्मी की कृपा से प्राप्त होता है ।   

                      ( इन्द्र उवाच )    

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ।।१।।

इन्द्र बोले - श्रीपीठ पर स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली हे महामाये । तुम्हें नमस्कार है । हाथ में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मि ! तुम्हें प्रणाम है ।

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि । 
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ।।२।।

गरुड़पर आरूढ़ हो कोलासुर को भय प्रदान करने वाली और समस्त पापों को हरने वाली हे भगवति महालक्ष्मि ! तुम्हें प्रणाम है ।

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि ।
सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ।।३।।

सब कुछ जानने वाली, सबको वर प्रदान करने वाली, समस्त दुष्टों को भय प्रदान करने वाली और सभी के दुःखों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मि ! तुम्हें नमस्कार है ।

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥४।।

सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्ष देने वाली हे मन्त्रपूत भगवति महालक्ष्मि ! तुम्हें सदा प्रणाम है ।

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥५।।

                  
हे देवि ! हे आदि-अन्त-रहित आदिशक्ते ! हे महेश्वरि ! हे योग से प्रकट हुई भगवति महालक्ष्मि ! तुम्हें नमस्कार है ।

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे ।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥६।। 

हे देवि ! तुम स्थूल, सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति हो, महोदरा हो और बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली हो । हे देवि महालक्ष्मि ! तुम्हें नमस्कार है ।

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥७।।

हे कमल के आसन पर विराजमान परब्रह्मस्वरूपिणी देवि ! हे परमेश्वरि ! हे जगदम्ब ! हे महालक्ष्मि ! तुम्हें मेरा प्रणाम है ।

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते ।
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥८।।

हे देवि ! तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और नाना प्रकारके आभूषणों से विभूषिता हो । सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देने वाली हो । हे महालक्ष्मि ! तुम्हें मेरा प्रणाम है ।

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥९।।

जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र का सदा पाठ करता है, वह सारी सिद्धियों और राज्यवैभव को प्राप्त कर सकता है ।

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ।।१०।।

जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है, उसके बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है । जो दो समय पाठ करता है, वह धन-धान्य से सम्पन्न होता है ।

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् । 
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥११।।

जो प्रतिदिन तीन काल पाठ करता है उसके महान् शत्रुओं का नाश हो जाता है और उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती हैं ।

।। इस प्रकार इन्द्र कृत “श्री महालक्ष्म्यष्टकम्” स्तोत्र समाप्त हुआ ।।

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