असाध्य रोगों से मुक्ति तथा सकारात्मकता हेतु करें सूर्याथर्वशीर्ष द्वारा सूर्योपासना

असाध्य रोगों से मुक्ति तथा सकारात्मकता हेतु करें सूर्याथर्वशीर्ष द्वारा सूर्योपासना

।। सूर्याथर्वशीर्ष ।।

भगवान् सूर्यनारायण प्रत्यक्षदेव के रूप में ब्रह्माण्ड में अवस्थित हैं । स्थावर एवं  जङ्गम समस्त विश्व के आत्मा हैं। सूर्यश्रुति के अनुसार समस्त प्राणियों की उत्पत्ति, स्थिति और अन्ततः विलय सूर्य में ही होती है। आद्यगुरुशंकराचार्य जी ने पञ्चदेवों की उपासना में भगवान् सूर्य की भी महत्ता पर प्रकाश डाला है। सूर्योपनिषद् , चाक्षुषोपनिषद्, सूर्यसूक्त आदि शास्त्र सूर्योपासना का विधान करती हैं। पुराणों की एक सूक्ति प्रचलित है-"आरोग्यं भास्करादिच्छेत्" आरोग्य प्राप्ति के लिए भुवन भास्कर की उपासना करनी चाहिए । कुण्डली में स्थित समस्त दोषों को दूर करने तथा असाध्य रोगों को शान्त करने के लिए सूर्यसूक्त के द्वारा सूर्योपस्थान तथा सूर्योपासना करनी चाहिए । जिससे सूर्यनारायण प्रसन्न होकर मनोवांछित फल की प्राप्ति कराते हैं । 

सूर्याथर्वशीर्ष के द्वारा सौर सम्प्रदाय में भगवान् सूर्य के उपासना का महत्व है । भगवान् सूर्यनारायण प्रत्यक्षदेव के रूप में ब्रह्माण्ड में अवस्थित हैं। स्थावर एवं जङ्गम समस्त विश्व के आत्मा हैं । सूर्यश्रुति के अनुसार समस्त प्राणियों की उत्पत्ति, स्थिति और अन्ततः विलय सूर्य में ही होती है । आद्यगुरुशंकराचार्य जी ने पञ्चदेवों की उपासना में भगवान् सूर्य की भी महत्ता पर प्रकाश डाला है ।

“सूर्य गायत्री आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्न:सूर्य: प्रचोदयात्” तथा अष्टाक्षर मन्त्र “ॐ घृणि: सूर्य आदित्योम्” ये दोनों इसी अथर्वशीर्ष में प्राप्त होते हैं। कुण्डली में स्थित समस्त दोषों को दूर करने तथा असाध्य रोगों को शान्त करने के लिए सूर्याथर्वसूक्त के द्वारा सूर्योपस्थान तथा सूर्योपासना करनी चाहिए। जिससे सूर्यनारायण प्रसन्न होकर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

हरिः ॐ ॥ अथ सूर्याथर्वाङ्गिरसं व्याख्यास्यामः । ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । आदित्यो देवता। हंसः सोऽहमग्निनारायणयुक्तं बीजम्। हृल्लेखा शक्तिः । वियदादिसर्गसंयुक्तं कीलकम् । चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे विनियोगः ।

हरिः ॐ।  भगवान् सूर्य के अथर्वांगिरस मन्त्रों पर व्याख्यान करेंगे। इस सूक्त के ब्रह्मा ऋषि हैं। गायत्री छन्द है। आदित्य देवता हैं। 'हंसः' 'सोऽहं' अग्निनारायणयुक्त बीज है। हृल्लेखा शक्ति है। वियदादि सृष्टिसे संयुक्त कीलक है। चारों प्रकारके पुरुषार्थोंकी सिद्धिमें इस मन्त्रका विनियोग किया जाता है।

षट्स्वरारूढेन बीजेन षडङ्गं रक्ताम्बुजसंस्थितम् । सप्ताश्वरथिनं हिरण्यवर्णं चतुर्भुजं पद्मद्वयाभयवरदहस्तं कालचक्रप्रणेतारं श्रीसूर्यनारायणं य एवं वेद से वै ब्राह्मण:।

छः स्वरोंपर आरूढ़ बीज के साथ, छः अंगों वाले, लाल कमल पर स्थित, सात घोड़ों वाले रथ पर सवार, हिरण्यवर्ण, चतुर्भुज तथा चारों हाथों में क्रमशः दो कमल तथा वर और अभय मुद्रा से युक्त कालचक्र के संवाहक श्रीआदित्य नारायण को जो तत्वपूर्वक जानता है, निश्चय ही वहीं तत्त्ववेत्ता है ।

ॐ भूर्भुवः स्वः । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च। सूर्याद्वै खल्विमानि भूतानि जायन्ते । सूर्याद्यज्ञः पर्जन्योऽन्नमात्मा । नमस्त आदित्य त्वमेव केवलं कर्मकर्तासि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वमेव प्रत्यक्षं विष्णुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं रुद्रोऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षमृगसि । त्वमेव प्रत्यक्षं यजुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं सामासि । त्वमेव प्रत्यक्षमथर्वासि । त्वमेव सर्वं छन्दोऽसि ।

जो प्रणव के अर्थभूत सच्चिदानन्दमय और भूः, भुवः एवं स्वः रूप से त्रिभुवनमय हैं, सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि करने वाले भगवान् सूर्यदेव के सर्वश्रेष्ठ तेज का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करें । भगवान् सूर्यनारायण सम्पूर्ण जंगम और स्थावर जगत्‌ के आत्मा हैं, निश्चयपूर्वक सूर्यदेव से ही ये भूत उत्पन्न होते हैं। सूर्यदेव से यज्ञ, बादल, अन्न (बल-वीर्य) एवं आत्मा (चेतना) का आविर्भाव होता है । हे आदित्य ! आपको हमारा नमस्कार है। आप ही केवल कर्मकर्ता हैं, आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं, आप ही प्रत्यक्ष विष्णु हैं, आप ही प्रत्यक्ष रुद्र हैं। आप ही प्रत्यक्ष ऋग्वेद हैं। आप ही प्रत्यक्ष यजुर्वेद हैं, आप ही प्रत्यक्ष सामवेद हैं। आप ही प्रत्यक्ष अथर्ववेद हैं। आप ही समस्त छन्दस्वरूप हैं।

आदित्याद्वायुर्जायते । आदित्याद् भूमिर्जायते । आदित्यादापो जायन्ते। आदित्याज्ज्योतिर्जायते । आदित्याद् व्योम दिशो जायन्ते। आदित्याद्देवा जायन्ते। आदित्याद्वेदा जायन्ते । आदित्यो वा एष एतन्मण्डलं तपति । असावादित्यो ब्रह्म । आदित्योऽन्तःकरणमनोबुद्धिचित्ता- हंकाराः । आदित्यो वै व्यानः समानोदानोपानः प्राणः। आदित्यो वै श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणाः । आदित्यो वै वाक्पाणिपादपायूपस्थाः । आदित्यो वै शब्दस्पर्श रूपरसगन्धाः । आदित्यो वै वचनादानागमनविसर्गानन्दाः । आनन्दमयो ज्ञानमयो विज्ञानमय आदित्यः ।

आदित्य से वायु उत्पन्न होती है । आदित्य से भूमि उत्पन्न होती है। आदित्य से जल उत्पन्न होता है। आदित्य से ज्योति (अग्नि) उत्पन्न होती है, आदित्य से आकाश और दिशाएँ उत्पन्न होती हैं । आदित्य से देवता उत्पन्न होते हैं। आदित्य से वेद उत्पन्न होते हैं । निश्चय ही ये आदित्यदेवता ही इस ब्रह्माण्ड-मण्डल को तपाते (गर्मी प्रदान करते) हैं । वे आदित्य ब्रह्म हैं । आदित्य ही अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकाररूप हैं। आदित्य ही व्यान, समान, उदान, अपान और प्राण- इन पाँचों प्राणों के रूप में विराजते हैं। आदित्य ही श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना एवं घ्राण-इन पाँच इन्द्रियों के रूप में क्रियाशील हैं। आदित्यदेव ही वाक्, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ - ये पाँचों कर्मेन्द्रिय भी हैं। आदित्य ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये ज्ञानेन्द्रियों के पाँच विषय हैं। आदित्य ही वचन, आदान, गमन, मलत्याग एवं आनन्द-ये कर्मेन्द्रियों के पाँच विषय हैं । आनन्दमय, ज्ञानमय एवं विज्ञानमय आदित्यदेव ही हैं।

नमो मित्राय भानवे मृत्योर्मां पाहि भ्राजिष्णवे विश्वहेतवे नमः । सूर्याद् भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु । सूर्ये लयं प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च । चक्षुर्नो देवः सविता चक्षुर्न उत पर्वतः । चक्षुर्धाता दधातु नः । आदित्याय विद्महे सहस्त्रकिरणाय धीमहि । तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् । 

मित्र देवता एवं सूर्यनारायण को प्रणाम है । हे प्रभो ! आप मेरी मृत्यु से रक्षा करें। दीप्तिमान्  विश्व के कारण सूर्यनारायण को नमस्कार है। सूर्य से सम्पूर्ण चराचर जीव उत्पन्न होते हैं, सूर्य के द्वारा ही उनका पालन होता है। अन्त में सूर्य में ही वे विलय हो जाते हैं। जो सूर्यनारायण हैं, वही मैं भी हूँ । सविता देवता हमारे नेत्र हैं एवं जो पर्वत नाम से प्रसिद्ध हैं, वे सूर्य ही हमारे चक्षु हैं। (सबको धारण करनेवाले) धाता नाम से प्रसिद्ध वे आदित्यनारायण हमारे नेत्रों को दृष्टिशक्ति प्रदान करके धारण करें। (श्रीसूर्यगायत्री-) हम भगवान् आदित्य को जानते हैं, हम अनन्त किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्यनारायण का ध्यान करते हैं। वे सूर्यदेव हमें प्रेरणा प्रदान करें ।

सविता पश्चात्तात्सविता पुरस्तात्सवितोत्तरात्ता- त्सविताधरात्तात् । सविता नः सुवतुसर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायु: ।

हमारे पीछे सविता देवता हैं, आगे सविता देवता हैं, बायें सविता देवता हैं और दक्षिण भाग में भी तथा ऊपर-नीचे भी सविता देवता हैं। सविता देवता हमारे लिये सब कुछ उत्पन्न करें (मेरी मनोकामना पूर्ण करें)। सविता देवता हमें दीर्घायु प्रदान करें।

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म घृणिरिति द्वे अक्षरे। इत्यक्षरद्वयम् । आदित्य इति त्रीण्यक्षराणि। एतस्यैव सूर्यस्याष्टाक्षरो मनुः ।

'ॐ' यह एकाक्षर मन्त्र है। 'घृणि:' यह दो अक्षरों का मन्त्र है। 'सूर्यः' यह दो अक्षरोंका मन्त्र है। 'आदित्यः' इस मन्त्रमें तीन अक्षर हैं। इन सबको मिलाकर सूर्यनारायणका अष्टाक्षर महामन्त्र - 'ॐ घृणिः सूर्य आदित्योम्' बनता है। [यही अथर्वांगिरस सूर्यमन्त्र है।]

यः सदाहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति । स वै ब्राह्मणो भवति। सूर्याभिमुखो जप्त्वा महाव्याधि- भयात्प्रमुच्यते । अलक्ष्मीर्नश्यति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति। अगम्यागमनात्पूतो भवति । पतितसम्भाषणात्पूतो भवति । असत्सम्भाषणात्पूतो भवति। मध्याह्ने सूर्याभिमुखः पठेत्। सद्योत्पन्नपञ्चमहापातकात्प्रमुच्यते । सैषां सावित्रीं विद्यां न किञ्चिदपि न कस्मैचित्प्रशंसयेत्। य एतां महाभागः प्रातः पठति स भाग्यवाञ्जायते । पशून् विन्दति। वेदार्थांल्लभते। त्रिकालमेतज्जप्त्वा क्रतुशतफलमवाप्नोति। हस्तादित्येजपति स महामृत्युं तरति। स महामृत्युं तरति। ये एवं वेद।। इत्युपनिषत् ।।

इस मन्त्रका जो प्रतिदिन जप करता है, वही ब्रह्मवेत्ता होता है, वही ब्राह्मण होता है। सूर्यनारायण की ओर मुख करके इसे जपने से महाव्याधि के भय से मुक्त हो जाता है। उसका दारिद्र्य नष्ट हो जाता है। अभक्ष्यभक्षण से पवित्र होता है, अगम्यगमन से पवित्र होता है। पतितसम्भाषण के दोष से पवित्र होता है। असत्यभाषण के दोष से पवित्र होता है। मध्याह्न में सूर्य की ओर मुख करके इसका जप करे । इस प्रकार करने से मनुष्य सद्यः उत्पन्न पाँच महापातकोंसे छूट जाता है। यह सावित्री विद्या है, इसकी किसी भी अनधिकारी से कुछ भी परिचर्चा न करे । जो महाभाग इसका प्रातःकाल पाठ करता है, वह भाग्यवान् हो जाता है। उसे गौ आदि पशुओं का लाभ होता है, वह वेद की गम्भीरता को जानने वाला होता है। इसका तीनों कालों में पाठ करने से सैकड़ों यज्ञों का फल प्राप्त होता है। सूर्य के हस्त नक्षत्र में रहते समय आश्विन महीने में इसका पाठ करता है वह महामृत्यु से तर जाता है। जो इस प्रकार से जानता है, वह महामृत्यु से तर जाता है। इस प्रकार यह श्रुति वचन है।

।। इस प्रकार “सूर्याथर्वशीर्ष” की प्रमाणिकता प्रतिपादित उपनिषदों में की गयी है ।।

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