भगवान् अच्युत (श्रीकृष्ण) की कृपा प्राप्ति के करें अच्युताष्टकम् स्तोत्र पाठ

भगवान् अच्युत (श्रीकृष्ण) की कृपा प्राप्ति के करें अच्युताष्टकम् स्तोत्र पाठ

श्रीमत् आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित यह स्तोत्र है। इस स्तोत्र में कुल नौ श्लोक हैं जिनमें से आठ श्लोकों में भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं का बहुत ही मनोरम वर्णन किया गया है | जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है एवं दु:ख-दारिद्रय, का नाश होता है |  

अच्युतं केशवं रामनारायणं
                 कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
                 जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे।।१।।

अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ तथा जानकीनायक रामचन्द्रजी को मैं भजता हूँ।

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं
               माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं
                देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे।।२।।

अच्युत, केशव, सत्यभामापति, लक्ष्मीपति, श्रीधर, राधिका जी द्वारा आराधित, लक्ष्मीनिवास, परम सुन्दर, देवकीनन्दन, नन्दकुमार का चित्त से ध्यान करता हूँ।

विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे
                    रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये।
वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने    
                      कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः।।३।।

जो विभु हैं, विजयी हैं, शंख चक्रधारी हैं, रुक्मिणी जी के परम प्रेमी हैं, जानकी जी जिनकी धर्मपत्नी हैं तथा जो व्रजांगनाओं के प्राणाधार हैं उन परमपूज्य, आत्मस्वरूप, कंसविनाशक मुरलीमनोहर आपको नमस्कार करता हूँ।

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण
                   श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज
                     द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक।।४।।

हे कृष्ण ! हे गोविन्द ! हे राम ! हे नारायण ! हे रमानाथ ! हे वासुदेव ! हे अजेय ! हे शोभाधाम ! हे अच्युत ! हे अनन्त ! हे माधव ! हे अधोक्षज (इन्द्रियातीत) ! हे द्वारकानाथ ! हे द्रौपदीरक्षक ! (मुझपर कृपा कीजिये)।

राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो
                    दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो-
                   ऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम्।।५।।

जो राक्षसों पर अतिकुपित हैं, श्रीसीता जी से सुशोभित हैं, दण्डकारण्य की भूमि की पवित्रता के कारण हैं, श्रीलक्ष्मण जी द्वारा अनुगत हैं, वानरों से सेवित हैं और श्रीअगस्त्य जी से पूजित हैं, वे रघुवंशी श्रीरामचन्द्र जी मेरी रक्षा करें।

धेनुकारिष्टकानिष्टकृद्द्वेषिहा
             केशिहा कंसहृद्वंशिकावादक:।
पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो
               बालगोपालकः पातु मां सर्वदा।।६।।

धेनुक और अरिष्टासुर आदि का अनिष्ट करने वाले, शत्रुओं का ध्वंस करने वाले, केशी और कंस का वध करने वाले, वंशी को बजाने वाले, पूतना पर कोप करने वाले, यमुनातट विहारी बालगोपाल मेरी सदा रक्षा करें।

विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं
                प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम्।
वन्यया मालया शोभितोरःस्थलं
                लोहिताङ्ग्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे।।७।।

विद्युत प्रकाशके सदृश जिनका पीताम्बर विभासित हो रहा है, वर्षाकालीन मेघों के सदृश जिनका अति शोभायमान शरीर है, जिनका वक्षःस्थल वनमाला से विभूषित है और चरणयुगल अरुणवर्ण हैं, उन कमलनयन श्रीहरि को भजता हूँ।

कुञ्चितैः कुन्तलैर्भाजमानाननं
               रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः।
हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं
               किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे।।८।।

जिनका मुख घुँघराली अलकों से सुशोभित है, मस्तक पर मणिमय मुकुट शोभा दे रहा है तथा कपोलों पर कुण्डल सुशोभित हो रहे हैं; उज्ज्वल हार, केयूर (बाजूबन्द), कंकण और किंकिणीकलाप से सुशोभित उन मंजुलमूर्ति श्रीश्यामसुन्दर को भजता हूँ।
                   फलश्रुति :-
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं
                 प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम्।
वृत्ततः सुन्दरं कर्तृविश्वम्भर-
                 स्तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम्।।९।।

जो पुरुष इस अति सुन्दर छन्द वाले और अभीष्ट फलदायक अच्युताष्टक को प्रेम और श्रद्धा से नित्य पढ़ता है, विश्वम्भर विश्वकर्ता श्रीहरि शीघ्र ही उसके वशीभूत हो जाते हैं।

।।इस प्रकार श्रीमत् शंकराचार्य जी द्वारा विरचित अच्युताष्टकम सम्पूर्ण हुआ।।

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