समस्त पापों तथा विघ्नों की निवृत्ति और आसुरी बाधाओं से मुक्ति हेतु करें बलराम कवच का पाठ

समस्त पापों तथा विघ्नों की निवृत्ति और आसुरी बाधाओं से मुक्ति हेतु करें बलराम कवच का पाठ

बल अर्थात् ( ओजबल, तेजबल, बुद्धिबल, ज्ञानबल ) आदि के आकर श्रीबलराम जी हैं । इनका स्मरण परम माङ्गलिक है इसी कारणवश इन्हें श्रीबलभद्रजी भी कहा जाता है। यह कवच देव, मनुज तथा असुरों के भय का नाशक है । पापरूप ईंधन को जलाने के लिए साक्षात् अग्नि है । बलराम कवच के पाठ करने से समस्त विघ्न शान्त होते हैं तथा बलभद्रजी की कृपा प्राप्ति होती है।

               दुर्योधन उवाच

गोपीभ्य: कवचं दत्तं गर्गाचार्येण धीमता।
सर्वरक्षाकरं दिव्यं देहि मह्यं महामुने।।१।।

दुर्योधन ने कहा- महामुने ! धीमान् गर्गाचार्य ने गोपियों को जो सब तरह से रक्षा करने वाला दिव्य कवच दिया था, आप उसे मुझको प्रदान कीजिये ।

               प्राड्विपाक उवाच 

स्नात्वा जले क्षौमधरः कुशासनः पवित्रपाणिः कृतमन्त्रमार्जनः । 
स्मृत्वाथ नत्वा बलमच्युताग्रजं सन्धारयेद् वर्म समाहितो भवेत् ॥ २।।

प्राङ्ड्विपाक मुनि बोले- मनुष्य जल में स्नान करके रेशमी वस्त्र धारण करे, कुशासन पर बैठे और हाथ में कुश की पवित्री धारणकर मन्त्र से शोधन (पवित्र) करे । तदनन्तर अच्युताग्रज भगवान् बलरामजी का स्मरण करके उन्हें प्रणाम करे । फिर मन को एकाग्र करके मन्त्ररूपी कवच को धारण करें ।

गोलोकधामाधिपतिः परेश्वरः परेषु मां पातु पवित्रकीर्तनः ।
भूमण्डलं सर्षपवद्विलक्ष्यते यन्मूर्ध्नि मां पातु स भूमिमण्डले ॥ ३।।

जो भगवान् गोलोकधाम के अधिपति हैं, जिनका कीर्तन परम पवित्र है, वे परमेश्वर शत्रुओं से मेरी रक्षा करें। जिनके मस्तक पर भूमण्डल सरसों की तरह प्रतीत होता है, वे भगवान् भूमण्डल में मेरी रक्षा करें ।

सेनासु मां रक्षतु सीरपाणि- र्युद्धे सदा रक्षतु मां हली च।
दुर्गेषु चाव्यान्मुसली सदा मां वनेषु सङ्कर्षण आदिदेवः ॥ ४।।

भगवान् सीरपाणि (हलधर) सेना में और भगवान् हली युद्ध में सदा मेरी रक्षा करें । मुसलधारी भगवान् दुर्ग में और आदिदेव भगवान् संकर्षण वन में मेरी रक्षा करें ।

कलिन्दजावेगहरो जलेषु नीलाम्बरो रक्षतु मां सदाग्नौ । 
वायौ च रामोऽवतु खे बलश्च महार्णवेऽनन्तवपुः सदा माम् ॥५।।

यमुना के प्रवाह को रोकने वाले भगवान् जल में और नीलाम्बरधारी भगवान् अग्नि से निरन्तर मेरी रक्षा करें । भगवान् राम वायु (आँधी)-में मेरी रक्षा करें । शून्य (आकाश) में भगवान् बलदेव और महान् समुद्र में अनन्तवपु भगवान् मेरी सदा रक्षा करें ।

श्रीवासुदेवोऽवतु पर्वतेषु सहस्रशीर्षा च महाविवादे। 
रोगेषु मां रक्षतु रौहिणेयो मां कामपालोऽवतु वा विपत्सु ॥६।।

पर्वतों पर भगवान् वासुदेव मेरी रक्षा करें । घोर विवाद में हजार मस्तक वाले प्रभु, रोग में श्रीरोहिणी-नन्दन तथा विपत्ति में भगवान् कामपाल मेरी रक्षा करें । 

कामात् सदा रक्षतु धेनुकारिः क्रोधात् सदा मां द्विविदप्रहारी ।
लोभात् सदा रक्षतु बल्वलारि: मोहात् सदा मां किल मागधारि: ॥७॥

धेनुकासुर के शत्रु भगवान् काम (कामना)-से मेरी सदा रक्षा करें । द्विविदपर प्रहार करने वाले भगवान् क्रोध से, बल्वल के शत्रु भगवान् लोभ से और जरासंध के शत्रु भगवान् मोह से सदा मेरी रक्षा करें ।

प्रातः सदा रक्षतु वृष्णिधुर्य: प्राह्णे सदा मां मथुरापुरेन्द्रः।
मध्यन्दिने गोपसखः प्रपातु स्वराट् पराह्णेऽवतु मां सदैव ॥८॥ 

भगवान् वृष्णिधुर्य प्रातःकाल के समय, भगवान् मथुरापुरी-नरेश पूर्वाह्ण में (प्रहर दिन चढ़े), गोपसखा मध्याह्न में और स्वराट् भगवान् पराह्ण (दिनके पिछले पहर) में सदा मेरी रक्षा करें ।

सायं फणीन्द्रोऽवतु मां सदैव परात्परो रक्षतु मां प्रदोषे।
पूर्णे निशीथे च दुरन्तवीर्य: प्रत्यूषकालेऽवतु मां सदैव।।९।।

भगवान् फणीन्द्र सायंकाल में तथा परात्पर प्रदोष के समय मेरी सदा रक्षा करें । मध्यरात्रि और प्रत्यूष काल के समय भगवान् दुरन्तवीर्य मेरी सदा रक्षा करें ।

विदिक्षु मां रक्षतु रेवतीपति-र्दिक्षु प्रलम्बारिरधो यदूद्वहः। 
ऊर्ध्वं सदा मां बलभद्र आरात् तथा समन्ताद् बलदेव एव हि ॥ १०।।

कोनों में रेवतीपति, दिशाओं में प्रलम्बासुर के शत्रु, नीचे यदूद्वह, ऊपर बलभद्र और दूर अथवा पास सब दिशाओं में भगवान् बलदेव जी मेरी सदा रक्षा करें । 

अन्तः सदाव्यात् पुरुषोत्तमो बहि- र्नागेन्द्रलीलोऽवतु मां महाबलः ।
सदान्तरात्मा च वसन् हरिः स्वयं प्रपातु पूर्णः परमेश्वरो महान् ॥ ११।।

भीतर से पुरुषोत्तम और बाहर से महाबल नागेन्द्रलील मेरी सदा रक्षा करें और पूर्ण परमेश्वर महान् हरि स्वयं सदा-सर्वदा मेरे हृदय में निवास करते हुए उत्कृष्ट रूप में सदा मेरी रक्षा करें।

देवासुराणां भयनाशनं च हुताशनं पापचयेन्धनानाम्।
विनाशनं विघ्नघटस्य विद्धि सिद्धासनं वर्मवरं बलस्य ।।१२।।

श्री बलभद्रजी का उत्तम कवच जो देव तथा असुरों के भय का नाश करने वाला है, पापरूप ईंधन को जलाने के लिए साक्षात् अग्निरूप और विध्नों के घट का विनाश करने वाला है ।

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिता में श्रीबलभद्रखण्ड के अन्तर्गत् श्रीप्राड्विपाक मुनि और दुर्योधन के संवाद में श्रीबलराम स्तोत्र कवच नामक बारहवें अध्याय में वर्णित यह कवच सम्पूर्ण हुआ ।

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