सुहाग रक्षा और पतिप्रेम वृद्धि हेतु करें "उमामहेश्वर " स्तोत्र का पाठ

सुहाग रक्षा और पतिप्रेम वृद्धि हेतु  करें "उमामहेश्वर " स्तोत्र का पाठ

यह स्तोत्र शंकराचार्य जी द्वारा प्रतिपादित है । इस स्तोत्र में कुल तेरह श्लोक हैं जिनमें से बारह श्लोकों में भगवती उमा (पार्वती) की स्तुति भगवान् शिव के साथ की गयी है और अन्तिम एक श्लोक में इस स्तोत्र पाठ की फलसिद्धि के विषय में बताया गया है । जो साधक इस स्तोत्र का प्रातः, मध्याह्न, या सांयकाल पाठ करता है वह सौ वर्ष पर्यंत जीवन धारण करके सभी प्रकार के ऐश्वर्यों और सौभाग्यों का उपभोग करता है तथा स्वयं की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है ।

विशेष :- कन्याओं के लिए उत्तम वर प्राप्ति हेतु यह स्तोत्र अतीव प्रभावशाली है ।

नमःशिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम् ।
नगेन्द्रकन्यावृषकेतनाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ १॥

नवीन युवा अवस्था वाले, परस्पर आलिंगन से युक्त शरीरधारी, ऐसे शिव और शिवा को नमस्कार है, पर्वतराज हिमालय की कन्या और वृषभचिह्नित ध्वज वाले शंकर-इन दोनों-शंकर और पार्वती को मेरा बारम्बार नमस्कार है ॥

नमः शिवाभ्यां सरसोत्सवाभ्यां नमस्कृताभीष्टवरप्रदाभ्याम् ।
नारायणेनाऽर्चितपादुकाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥२॥

महान् आह्लादपूर्वक उत्सव में प्रवृत्त, नमस्कार करने मात्रसे अभीष्ट वर देनेवाले भगवान् शिव और शिवा को नमस्कार है। श्रीनारायण द्वारा जिनकी चरणपादुकाएँ पूजित हैं, ऐसे शंकर- पार्वती को मेरा बारम्बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यां वृषवाहनाभ्यां विरञ्चिविष्ण्विन्द्रसुपूजिताभ्याम्
विभूतिपाटीरविलेपनाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ ३ ॥

वृषभ पर आसीन एवं ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि प्रमुख देवों से सम्यक् पूजित शिव-शिवा को मेरा प्रणाम है। विभूति (भस्म) तथा पाटीर (सुगन्धित द्रव्य) आदि के अंगराग से लिप्त शंकर- पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यां जगदीश्वराभ्यां जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम् । 
जम्भारिमुख्यैरभिवन्दिताभ्यां नमो नम: शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ ४॥

अखिल ब्रह्माण्डनायक, जगत् पति , विजयरूप शरीरधारी शिव और शिवा को मेरा नमस्कार है। जम्भ दैत्य के शत्रु इन्द्रादि प्रमुख देवों द्वारा नमस्कृत शंकर और पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यां परमौषधाभ्यां पञ्चाक्षरीपञ्जररञ्जिताभ्याम्
प्रपञ्चसृष्टिस्थितिसंहृतिभ्यां  नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ ५ ॥

योगी-जनों के लिये परम औषधरूप, 'नमः शिवाय' इस पंचाक्षरीरूप पंजर से सुशोभित शिव और शिवा को मेरा नमस्कार है। अखिल जगत्प्रपंच-सृष्टि, स्थिति तथा संहारस्वरूप शंकर और पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यामतिसुन्दराभ्या-मत्यन्तमासक्तहृदम्बुजाभ्याम्
अशेषलोकैकहितङ्कराभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ ६ ॥

अत्यन्त सुन्दर स्वरूपवाले, अपने भक्तों (योगी-जनों) के हृदय- कमल में निवास करने वाले शिव और शिवा को मेरा नमस्कार है। समस्त चराचर जीवों के एकमात्र हितकारी शंकर और पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यां कलिनाशनाभ्यां कङ्कालकल्याणवपुर्धराभ्याम्।
कैलासशैलस्थितदेवताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ ७ ॥

जो कलि के सभी दोषों के विनाशक हैं तथा [जिस प्राणी से शरीर में मात्र हड्डियों का ढाँचा रह गया हो, ऐसे मृत-प्राय प्राणी को ] जो तारक मन्त्र द्वारा परमपद प्राप्त कराने वाले हैं, ऐसे कैलासपर्वत पर निवास करने वाले शंकर-पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यामशुभापहाभ्या- मशेषलोकैकविशेषिताभ्याम् ।
अकुण्ठिताभ्यां स्मृतिसम्भृताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ ८ ॥

अशुभों के विनाशक एवं समस्त लोकों में एकमात्र अद्वितीय शिव और शिवा को नमस्कार है। अबाधित शक्तिसम्पन्न और भक्तों का सदा स्मरण रखने वाले भगवान् शंकर-पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यां रथवाहनाभ्यां रवीन्दुवैश्वानरलोचनाभ्याम् ।
राकाशशाङ्काभमुखाम्बुजाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ ९ ॥

रथरूपी वाहन पर स्थित, सूर्य-चन्द्र-अग्निरूप तीन नेत्र वाले शिव और शिवा को मेरा नमस्कार है। पूर्णिमा की रात के चन्द्रमा की आभा के समान मुख-कमल वाले शंकर-पार्वतीको मेरा बार- बार नमस्कार है ॥

नमः शिवाभ्यां जटिलन्धराभ्यां जरामृतिभ्यां च विवर्जिताभ्याम् । 
जनार्दनाब्जोद्भवपूजिताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ।।१०।।

जटाजूटधारी, जरा (वृद्धावस्था) एवं मृत्यु से रहित शिव और शिवा को मेरा नमस्कार है। जनार्दन भगवान् (विष्णु) एवं ब्रह्माजी द्वारा पूजित भगवान् शंकर और देवी पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यां विषमेक्षणाभ्यां बिल्वच्छदामल्लिकदामभृद्भ्याम् ।
शोभावतीशान्तवतीश्वराभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ ११॥

त्रिनेत्रधारी, बिल्वपत्र तथा मालती आदि सुगन्धित पुष्पों की माला धारण करने वाले शिव-शिवा को मेरा नमस्कार है। शोभावती और शान्तवती के ईश भगवान् शंकर एवं पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

नमः शिवाभ्यां पशुपालकाभ्यां जगत्त्रयीरक्षणबद्धहृद्भ्याम् ।
समस्तदेवासुरपूजिताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ १२॥

समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करने तथा तीनों लोकों की रक्षा करनेमें जिनका हृदय निरन्तर लगा हुआ है, ऐसे शिव-शिवा को मेरा नमस्कार है। समस्त देवों तथा असुरों द्वारा पूजित शंकर और पार्वती को मेरा बार-बार नमस्कार है ॥ 

स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं शिवपार्वतीयं  भक्त्या पठेद् द्वादशकं नरो यः। 
स सर्वसौभाग्यफलानि भुंक्ते शतायुरन्ते शिवलोकमेति ॥ १३॥

जो प्राणी अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक शिव और पार्वती-सम्बन्धी बारह श्लोकों वाले इस स्तोत्र का प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल पाठ करता है, वह सौ वर्षपर्यन्त जीवन धारणकर सभी सौभाग्यफलों का उपभोग करता है और अन्त में शिवलोक को प्राप्त होता है ॥

॥ इस पराकार श्रीमत् शंकराचार्य जी द्वारा विरचित उमामहेश्वर स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥

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