अक्षय नवमी का व्रत रखने से होती है क्षय रहित पुण्य की प्राप्ति

अक्षय नवमी का व्रत रखने से होती है क्षय रहित पुण्य की प्राप्ति

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को अक्षय नवमी के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि अक्षय नवमी के दिन भगवान विष्णु आंवले के वृक्ष पर वास करते हैं. इस दिन विवाहित स्त्रियां व्रत रखती हैं और आंवले के वृक्ष की पूजा-पाठ करती हैं तथा इसके नीचे भोजन बनाती हैं. जिससे उनके घर में सुख-शांति, धन और  समृद्धि की प्राप्ति होती है. आज भी अधिकतर लोग अक्षय नवमी के व्रत से अज्ञात हैं और इस अज्ञानता के कारण ही हम अपनी प्राचीन संस्कृति और पूजा- पाठ को भूलते ही जा रहे हैं.  तो चलिए आज इस लेख के माध्यम से अक्षय नवमी व्रत के महत्व के बारे में जानते हैं.

सूत जी ने बताया अक्षय नवमी का महत्व

अक्षय नवमी की कथा सत्यभामा से जुड़ी हुई है. एक समय की बात है जब सूत जी अपने शिष्यों को कथा सुनाते हुए कहते हैं कि, सत्यभामा ने जब भगवान से पूछा कि मैंने ऐसे कौन से काम किए थे, जो मृत्यु लोक में जन्म लेकर भी मर्त्य भाव से ऊपर उठ आपकी अर्धांगिनी बन गई. तब भगवान ने कहा, कि तुम सतयुग के अंत में मायापुरी (हरिद्वार) में एक ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुई थी. विवाह की आयु होने पर तुम्हारे पिता ने तुम्हारा विवाह अपने ही शिष्य से कर दिया और सभी लोग साथ में जीवन यापन करने लगे.

ऐसी हुई अक्षय नवमी व्रत की शुरुआत

भगवना सत्यभामा को बताते हैं कि, एक दिन तुम्हारे पति और पिता वन में समिधा (लकड़ी) लेने गए और वहां पर एक राक्षस के द्वारा उन्हें मृत्यु प्राप्त  हुई. तुम्हारे पिता ने भगवान सूर्य की विशेष उपासना जीवन पर्यंत की थी, जिसके कारण उन्हें मेरे पार्षदों के द्वारा वैकुंठ लाया गया और वह वैकुंठ निवासी बने. उस समय तुमने जब अपने पति और पिता की मृत्यु की सूचना सुनी तो तुमने बहुत विलाप किया, फिर तुमने घर के पात्रों को बेचकर अपने पिता, पति का पारलौकिक कर्म किया. तुम उसी नगर में रहकर मेरे भजन पूजन करने लगी, उस समय तुमने एकादशी उपवास और कार्तिक मास अक्षय नवमी पूजन का जीवन भर पालन किया.

सत्यभामा को हुई वैकुण्ठ की प्राप्ति

 भगवान कहते हैं कि यह व्रत मुझे अत्यधिक प्रिय है, क्योंकि इस व्रत से  पुण्य, पुत्र एवं संपत्ति की प्राप्ति होती है. जब कार्तिक मास में सूर्य तुला राशि पर होता है तब प्रात: स्नान करने से महापातकी व्यक्ति भी मेरे पास वैकुंड में आता है. इस प्रकार गुणवती, प्रतिवर्ष कार्तिक मास में व्रत किया करती थी. वह विष्णु की परिचर्या में नित्य निरंतर विधिवत पूजन करती थी. समय बीतता गया और वृद्धावस्था में उनका शरीर दुर्बल होने लगा. एक दिन जब वह गंगा स्नान करने गई, जैसे ही उन्होंने जल के भीतर कदम रखा तो वह ठंड से कांपने लगी और फिर घबराकर गिर पड़ीं, उसी दौरान आकाश से विमान धरती की ओर आने लगा, विमान के निकट आते ही सत्यभामा ने  दिव्य रुप धारण कर वैकुण्ठ में प्रवेश कर गईं.

फिर भगवान ने कहा कि तुमने अपने कर्मों को पति स्वरूप श्री विष्णु की सेवा में निवेदन किया था, इसलिए तुम मेरी पत्नी बनीं और अक्षय नवमी को जो भी आंवला के वृक्ष में मेरी पूजा करेगा तुम लक्ष्मी रूप में उसके गृह पर निवास करोगी.

अक्षय नवमी के दिन रखें इन बातों का ध्यान

व्रत चाहे कोई भी हो, मगर उसे सच्चे भाव के साथ रखना चाहिए और व्रत के दौरान कुछ नियमों का पालन करना चाहिए, जो कि इस प्रकार हैं--

  • पूजा के दौरान जमीन में कंबल का आसन लगाकर बैठें.
  • अक्षय नवमी के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर जप करना चाहिए.
  • व्रत के दिन चौकी लगाकर ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिए.
  • दिन के तीसरे पहर में ही अपने घर को वापिस आ जाना चाहिए, फिर शाम के वक्त भगवान विष्णु की पूजा अराधना करनी चाहिए.
  • व्रत के दिन आंवले के वृक्ष में सांय के वक्त तिल डालकर घी का दीपक जलाना विशेष शुभ माना जाता है.
  • इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने से घर में माता लक्ष्मी जी आती हैं.

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