भूमि पूजन का महत्व एवं निर्माण कार्य से पूर्व भूमि शोधन

भूमि पूजन का महत्व एवं निर्माण कार्य से पूर्व भूमि शोधन

सनातन धर्म ग्रंथों में भूमि अथवा धरती को माता का स्थान प्राप्त है। क्योंकि हमारी धरती माता समस्त संसार का पालन करती है। धरती माता संसार के समस्त प्राणियों के लिए अन्न, वायु, जल रत्न आदि को अपने अंदर समाहित किए हुए हैं। भूमि में हम आवास, कार्यालय, सड़कें आदि का आधुनिक युग की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्माण कर रहे हैं। हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं- "माताभूमि: पुत्रो अहं पृथिव्याः।" अर्थात् भूमि हमारी माता है, हम सब पृथ्वी की संतानें हैं और माता के प्रति हमारा यह कर्तव्य बन जाता है कि हम उनकी विधिवत आराधना एवं पूजा करें। यही कारण है कि भूमि पर किसी भी निर्माण कार्य से पूर्व उस स्थान की पूजा एवं अर्चना की जाती है। उनके पूजन के पश्चात ही निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाता है। निर्माण कार्य से पूर्व भूमि शोधन के लिए तीन दिनों तक उस  स्थान पर गाय का वास करवाना चाहिए। भूमि शोधन की एक अन्य विधि यह भी है कि गाय के गोबर, गंगा जल एवं गौ मूत्र से उस स्थान को लीपना चाहिए, जिससे  वह स्थान परम पवित्र हो जाता है।  

भूमि पूजन का महत्व:-    

आवास औरव्यवसाय स्थल के लिए निर्माण हेतु जब हम नई भूमि खरीदते हैं, तो उस भूमि पर निर्माण कार्य करने से पूर्व धरती मां, भगवान वास्तु देवता और उस क्षेत्र के क्षेत्रपाल और कक्षप, सर्प, कलश आदि देवताओं से हम भूमि की शुद्धि हेतु प्रार्थना करते हैं एवं निर्माण कार्य की आज्ञा मांगते हैं। इनकी पूजा के प्रभाव से भूमि में नकारात्मकता का निदान होकर सकारात्मक ऊर्जा का सन्निवेश होता है। भूमि पूजन भूमिगत आश्रय लेने वाले जीवों से प्रार्थना हेतु भी आवश्यक है, क्योंकि जब हम भूमि खरीदते हैं तो कहीं न कहीं किसी न किसी की भावनाओं को आहत करते है। इसके साथ ही निर्माण के समय अज्ञातवश, जिस भी जीव को हानि पहुंचती है उसका दोष पाप भूस्वामी को लगता है, अतः अज्ञातवश हुए अपराध की क्षमा के निमित्त शास्त्रों में भूमि पूजन का विधान किया गया है। भूमि पूजन करने मात्र से गृह निर्माण संबंधि सारे पाप समाप्त हो जाते हैं।  

भूमि पूजन कैसे करें 

जब हम भूमि खरीदते हैं, तो तत्पश्चात पूजन का विधान शास्त्रों में बताया गया है। भूमि पूजन में घर का कोई भी सदस्य बैठ सकता है, परन्तु भूमि पूजा विशेषतः घर के बड़े अर्थात मुखिया को अपनी धर्म पत्नी सहित करनी चाहिए। भूमि पूजन अनुष्ठान को वैदिक विधि द्वारा आचार्यों या ब्राह्मणों द्वारा ही संपन्न करवाना चाहिए, जिससे सम्पूर्ण फल प्राप्ति होती है।  

भूमि पूजन किस दिशा में करें?  

वास्तु शास्त्र में बताया गया है कि भूमि पूजन के लिए दिशा सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विभिन्न सूर्य संक्रांतियों में राहु के मुख से पीठ की दिशा (पृष्ठवर्तिनी) में घर की नींव के लिए खोदना चाहिए। भूखंड में सूर्य की राशि के अनुसार सर्पाकार राहु संपूर्ण भूमि में पैर पसार कर लेटा होता है। इसलिए जिस स्थान पर घर की नींव के लिए खोदा जा रहा है वहां पर राहु का कोई अंश नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि राहु के किसी भी अंग में प्रहार होता है, तो गृहस्वामी का जीवन कष्टकारी हो जाता है।   

  • सूर्य वृष, मिथुन या कर्क (ज्येष्ठ, आषाढ़ या श्रावण) में हो तो नींव की खुदाई का प्रारंभ नैऋत्य (दक्षिण, पश्चिम) कोण से करें।  
  • सूर्य सिंह, कन्या या तुला (भाद्रपद, आश्विन या कार्तिक) में हो तो नींव की खुदाई का प्रारंभ आग्नेय कोण (पूर्व, दक्षिण) में करें।  
  • सूर्य वृश्चिक, धनु या मकर (मार्गशीर्ष, पौष या माघ) में हो तो नींव की खुदाई का प्रारंभ ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में करें।  
  • सूर्य मेष, कुम्भ या मीन (वैशाख, फाल्गुन या चैत्र) में हो तो नींव की खुदाई का आरम्भ वायव्य कोण में (उत्तर पश्चिम) से करें।  

विशेष:- प्रत्येक सूर्य संक्रांति से 5, 7, 9, 15, 21 और 24वें प्रविष्टे को पृथ्वी सोई रहती है, अतः सुप्त भूमि के दिवसों में यथा संभव कृषि, गृह निर्माण, वापी, कुआं, तालाब आदि के लिए भूमि की खुदाई न करें।

भूमि पूजन हेतु उत्तम मास 

• वैशाख, ज्येष्ठ, श्रावण, मार्गशीष, माघ तथा फाल्गुन श्रेष्ठ होते हैं।   

• भाद्रपद और कार्तिक मास मध्यम हैं।   

उत्तम तिथि  

कृष्ण पक्ष:- द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी।  

शुक्ल पक्ष:- द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, पूर्णिमा।  

उत्तम नक्षत्र:- अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, तीनों उत्तरा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और रेवती।   

उत्तम वार:- सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार।  

भूमि पूजन से लाभ:-  

  • भूमि पूजन से भूमि की शुद्धि होती है।  
  • धरती मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है।  
  • निर्माण कार्य के समय आने वाली समस्याओं से मुक्ति मिलती है।  
  • भूमि पर से वास्तु दोषों और नकारात्मकता का शमन होता है।  
  • भूमि के निर्माण के समय अज्ञानवश हुई जीव हत्या से मुक्ति मिलती है।  
  • क्षेत्रपाल, भूमि, वस्तु देवता और दिशाओं के देवताओं की कृपा बनी रहती है।  

भूमि पूजन का मुहूर्त  

  • 25 जनवरी 2024, गुरुवार, दिन 10:38 के बाद। 
  • 26 जनवरी 2024, शुक्रवार, दिन 10:28 तक। 
  • 01 फ़रवरी 2024, गुरुवार, दिन 10:27 से दोपहर 2:32 तक। 
  • 14 फरवरी 2024, बुधवार, दिन 10:43 के बाद। 
  • 15 फरवरी 2024, गुरुवार, दिन 9:26 तक। 
  • 06 मार्च 2024, बुधवार, दोपहर 2:52 के बाद। 
  • 11 जुलाई 2024, गुरुवार, दोपहर 1:04 के बाद। 
  • 12 जुलाई 2024, शुक्रवार, प्रातः 7:09 से दोपहर 12 : 54 तक। 
  • 17 जुलाई 2024, बुधवार, 1.प्रातः 7:55 से दिन 10:13 तक, 2.दोपहर 12:29 से 2:47 तक। 
  • 27 जुलाई 2024, शनिवार, दिन 11:26 के बाद  
  • 31 जुलाई 2024, बुधवार,1. प्रातः 7: 00 से दिन 9:19 तक, 2. दिन 11:34 से दोपहर 2:14 तक। 
  • 1 अगस्त 2024, गुरुवार दिन 10:24 तक। 
  • 19 अगस्त 2024, सोमवार,दिन 8:10 से दोपहर 12:51 तक। 
  • 28 अगस्त 2024, बुधवार, दिन 9:50 से दोपहर 2:27 तक। 
  • 4 सितम्बर 2024, बुधवार, दिन 9:18 से दोपहर 1:55 तक। 
  • 14 सितम्बर 2024, शनिवार, दिन 8:38 से दिन 9:37 तक। 
  • 18 अक्टूबर 2024, शुक्रवार, प्रातः 6:23 से दोपहर 01:04 मिनट तक। 
  • 24 अक्टूबर 2024, गुरुवार, दिन  8:18 से दोपहर 12:28 तक। 
  • 4 नवम्बर 2024, सोमवार, दिन 8:04 तक। 
  • 18 नवम्बर 2024, सोमवार, दिन 8:58 से दोपहर 12:28 तक। 
  • 25 नवम्बर 2024, सोमवार, दिन 8:31 से दोपहर 12:29 तक। 
  • 27 नवम्बर 2024, बुधवार, दिन 8:23 से दोपहर 12:10 तक। 
  • 7 दिसंबर 2024, शनिवार, प्रातः 7:44 से दिन 11:31 तक। 
  • 11 दिसम्बर 2024 बुधवार, दिन 11:48 के बाद। 
  • 12 दिसम्बर 2024 गुरुवार,दिन 9:53 तक।   

उपरोक्त उल्लिखित शुभ मुहूर्त में आप भूमि पूजन कर सकते हैं। यद्यपि यह प्रक्रिया केवल वैदिक पंडित एवं ब्राह्मणों के द्वारा ही संपन्न की जाती है। यदि आप भी वैदिक विधि विधान द्वारा भूमि पूजन करना चाहते हैं तो वैकुण्ठ से संपर्क करें।   

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