Chhath Puja 2023: छठी मैया की पूजा का पौराणिक महत्व

Chhath Puja 2023: छठी मैया की पूजा का पौराणिक महत्व

आज से आस्था के महापर्व छठ की शुरूआत हो गई है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि के दिन छठ का त्यौहार मानाया जाता है, जिसमें छठी मैया एवं सूर्य देव की पूजा और उपासना की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया की पूजा करने से वह अति प्रसन्न होती हैं और निसंतान की पुत्र कामना को पूर्ण करती हैं. छठ का पर्व मुख्य रूप से बिहार और उससे संग्लन सीमा पूर्वी उत्तरप्रदेश और झारखण्ड में मनाया जाता है। लेकिन आज विश्व के हर एक कोने में छठ पूजा को हर्षो उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।  

छठ पूजा का महत्व 

छठ पूजा मुख्यत: पुत्र प्राप्ति एवं संतान की दीर्घायु के लिए की जाती है। इस पर्व में सूर्योदय के साथ-साथ डूबते सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है। छठ पूजा में सभी सौभाग्यवती स्त्रियां 36 घंटे का व्रत रखती हैं और संतान की दीर्घायु की कामना करती है। व्रत रखने से निसंतान को संतान की प्राप्ति होती है। संतान और पति के उत्तम वैभव के लिए छठी मैया की पूजा की जाती है। ये सारी मान्यताएं ही छठ को महापर्व बनाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छठ पूजा का पर्व त्रेतायुग से मनाया जा रहा है और इसका सीधा संबंध प्रकृति से है।  

क्यों होती है छठी मैया की पूजा 

ब्रह्मदेव सृष्टि के रचयिता हैं, लेकिन उन्होंने सृष्टि की रचना करने के लिए स्वयं को दो भागों में बांटा, दाएं भाग से पुरुष और बाएं से प्रकृति का स्वरूप बना। प्रकृति भी 6 भागों में विभाजित हुई, जिसमें पहला भाग देवसेना और छठे भाग से छठी मैया बनीं। एक कथा के अनुसार, प्रियंवद नाम के एक राजा थे, लेकिन वह नि:संतान होने के कारण बेहद दुखी थे। अंतत: वह महर्षि कश्यप के पास गए और महर्षि ने राजा को संतान प्राप्ति हेतु यज्ञ करवाने के लिए कहा। यज्ञ के बाद महर्षि ने राजा की पत्नी मालिनी को यज्ञ आहुति वाले प्रसाद को ग्रहण करने के लिए कहा और कुछ समय बाद उनके घर में बच्चे ने जन्म तो लिया, लेकिन वह मृत था। अपने मृत पुत्र को देखकर राजा ने बहुत विलाप किया। राजा वियोग में अपने प्राणों की आहुति देने ही वाले थे कि मां देवसेना वहां पर प्रकट हुईं। तब उन्होंने राजा प्रियंवद को प्रकृति और मनुष्य प्रेम के बारे में बताया और कहा कि यदि आप छठी मैया की पूजा करते हैं तो अवश्य ही आपको पुत्र की प्राप्ति होगी। अतत: मैया के कथनानुसार राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई और तभी से हर वर्ष छठी मैया की पूजा संतान प्राप्ति हेतु की जाने लगी।  

छठ पूजा 2023 मुहूर्त 

छठ पर्व 4 दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन नहाय खाए की परंपरा है, जिसमें विवाहित महिलाएं पहले अपने घर की सफाई और शुद्धिकरण कर नदी में स्नान करती हैं और फिर व्रत रखती हैं। उसके पश्चात केवल एक ही समय का सात्विक आहार ग्रहण करती हैं। दूसरे दिन को खरना कहा जाता है और रात में भोज और प्रसाद तैयार किए जाते हैं। छठ का तीसरा और चौथा दिन अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इस दिन व्रती महिलाएं नदी या तालाब से डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं और आखिरी दिन सूर्योदय के उपरांत 36 घंटे के व्रत के बाद सूर्य की पूजा एवं अर्घ्य दिया जाता है।  

  • नहाय खाय    - 17 नवंबर, शुक्रवार,  
  • खरना        - 18 नवंबर, शनिवार 
  • संध्या अर्घ्य     - 19 नवंबर, रविवार सायं 5:26 से 
  • सूर्योदय अर्घ्य    - 20 नवंबर, सोमवार प्रात: 6:47 से 

छठ पूजा में सूर्य देव का महत्व 

छठ पूजा में छठी मैया के साथ सूर्यदेव की उपासना की जाती है। चूंकि छठ पूजा को नई फसल और प्रकृति का पर्व भी माना जाता है, इसलिए इस दिन सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। ऋग्वेद में उल्लेखित है कि सूर्य ही अपने तेज से सबको प्रकाशित करते हैं।  यजुर्वेद में कहा गया है कि सूर्य ही सम्पूर्ण भुवन को उज्जीवित करते हैं। अथर्ववेद के अनुसार, सूर्य हृदय की दुर्बलता, हृद्रोग और कासरोग को खत्म करते हैं। भारत में कार्तिक मास को देव मास कहा गया है, इस मास सूर्य एवं अन्य प्रत्यक्ष देवताओं की आराधना आराध्य देवता तक पहुंचती है। इसलिए कई विशेष स्थान पर माताएं भगवान सूर्य का व्रत रखती हैं और उनसे अपने पुत्र तथा पति की दीर्घायु एवं पुत्र प्राप्ति की कामना करती हैं।  

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