कुण्डली के समस्त भावों पर सूर्य ग्रह का प्रभाव तथा फल

कुण्डली के समस्त भावों पर सूर्य ग्रह का प्रभाव तथा फल

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का विशेष महत्व है। भगवान सूर्य समस्त जगत की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित हैं। हिंदू धर्म में सूर्य को देवता का स्वरूप मानकर उनकी उपासना की जाती है। सूर्य देव प्राकृतिक ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत हैं। सूर्य ग्रह के भिन्न-भिन्न प्रभाव हैं, जातक की जन्म कुण्डली में 12 भाव होते हैं, इन भावों में बैठकर सूर्य अलग-अलग फल प्रदान करते हैं। जन्मपत्री में सूर्य ग्रह यदि शुभ स्थान पर स्थित हो, तो जातक को उसके शुभ परिणाम मिलते हैं। सूर्य की यह स्थिति जातकों के लिए सकारात्मक पक्ष को मजबूत करने में मददगार होती है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को मनोवांछित फल प्राप्त होता है। जातक स्वयं अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित होता है और जातक का अपने सभी कार्यों के ऊपर नियंत्रण रहता है। सूर्य किस भाव का स्वामी है, उसका लग्नेश के साथ कैसा संबंध है, उसकी दृष्टि कहां है तथा उसका क्या फल है, इन सभी का सूर्य ग्रह के साथ द्वादश भावों में बैठकर क्या फल प्राप्त होता है, यह समस्त प्रश्नों का उत्तर इस लेख में जानेंगे। 

सूर्य ग्रह का द्वादश भावों पर प्रभाव और फल 

प्रथम भाव- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि प्रथम भाव में सूर्य की उपस्थिति है तो यह इस बात का संकेत है कि, ऐसे जातकों का स्वभाव- धार्मिक धर्म कर्म के कार्यों में रूचि, ईमानदार- सत्य के साथ कार्य करने वाले, चंचल, निर्दयी, स्वभाव में आक्रामकता, बिना सोचे समझे कार्य को करने वाले, आलसी, घमण्डी, धैर्य का ना होना अथवा ऐसे जातक कामी होते हैं। इसके साथ ही इन जातकों में गंजेपन की समस्या, नेत्र सम्बधी रोग, स्त्री, पुत्र कुटुम्बीजनों से जीवन में निरन्तर क्लेश बना रहता है तथा इस प्रकार के जातकों के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। ऐसे जातक तेजस्वी होते हैं। 

द्वितीय भाव- सूर्य ग्रह द्वितीय भाव में बैठकर जातक के जीवन से धन लाभ, पुत्र, वाहन आदि सुख सुविधाओं से‌ दूर करते हैं अथवा करीबी मित्रों से अलगाव, दूसरे के घर में निवास करने वाला, इस प्रकार का जातक भाग्यवान, सुखवान और धार्मिक प्रवृत्ति का होता है। शुभ कार्यों में खर्च करने वाला, इस प्रकार के जातकों में निरन्तर कुटुम्बीजनों से कलह बनीं रहती है अथवा कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। स्त्री, पुत्र, सुखविहीन रहता है तथा इस प्रकार का जातक दुबला- पतला होता है।  इन जातकों को लोहा एवं तांबे के व्यापार से धन लाभ होता है, लेकिन पारिवारिक जीवन में सुख की कमी रहती है। 

तृतीय भाव- इस प्रकार का जातक प्रिय बोलने वाला, धन, वाहन आदि से युक्त होता है। वह धार्मिक प्रवृत्ति वाला, बलशाली, प्रतापी, पराक्रमी अथवा अपने भाइयों से कष्ट भोगने वाला, विदेश में यात्रा करने वाला, सर्वत्र विजय प्राप्त करने वाला, समाज में यश, कीर्ति और सम्मान की प्राप्ति करने वाला होता है। स्त्री, पुत्र आदि से युक्त, धैर्यवान क्षमाशील, स्त्रियों का प्रिय होता है। 

चतुर्थ भाव- इस प्रकार का जातक विदेश में निवास करने वाला, बन्धुओं से विरोध करने वाला, धैर्यवान, कोमल हृदय का, उत्कृष्ट संगीतज्ञ, धनवान होता है। ऐसे जातकों का दांपत्य जीवन सुख में रहता है, पिता के धान का नाश करने वाला अथवा अनेक स्थानों में निवास करने वाला होता है। 

पंचम भाव-  इस प्रकार का जातक तीक्ष्ण बुद्धि वाला, विद्या को जानने वाला, ठगी करने वाला, आलसी, पैसों का संचय करने वाला, उदर रोग से ग्रसित, चंचल स्वभाव का, क्रोधी स्वभाव का, युवावस्था में आर्थिक समस्या से पीड़ित, क्रूर कार्यों में संलिप्त, दुष्ट हृदय वाला होता है, लेकिन भगवान शिव का परम भक्त होता है। 

षष्ठम भाव- इस प्रकार का जातक शत्रुओं का संहार करने वाला, पराक्रमी, योगी, प्रखर बुद्धि वाला, परिजनों की देखरेख करने वाला, पारिवारिक सुख की प्राप्ति, भोग विलासी, समाज में प्रतिष्ठा, प्रेमी, बलशाली, तेजस्वी तथा सुंदर होता है। 

सप्तम भाव- इस प्रकार के जातक को स्त्री पक्ष से दुख की प्राप्ति होती है, शरीर में व्याधि, सदैव चिंताग्रस्त, मन में व्याकुलता, सदैव ईर्ष्या, परस्त्रीगमन करने वाला, चंचल स्वभाव का, सदैव पाप कार्यों में संलिप्त, कुरूप, दुष्ट की संगति करने वाला, गुप्त रोगी, लक्ष्मी हीन, दुर्बल तथा सदैव भययुक्त रहने वाला होता है। 

अष्टम भाव- इस प्रकार का जातक क्रोधी, अल्प धनवान, दुर्बल शरीर वाला, स्वयं को कष्ट देने वाला, विदेश में प्रेम सम्बन्ध स्थापित करने वाला, आलसी, परस्त्रीगमन करने वाला, त्यागी, रोग से पीड़ित, शीलरहित तथा ऐसे जातकों का अपने बन्धुजनों से अलगाव रहता है। 

नवम भाव- इस प्रकार के जातक धार्मिक प्रवृत्ति वाले होते हैं और उत्तम बुद्धि वाले ऐसे जातकों का मातृपक्ष से सदैव बैर रहता है, भाई से क्लेश, चिंताग्रस्त, सत्यवक्ता, देवता अथवा ब्राह्मणों का सत्कार करने वाले, बाल्यावस्था में रोगी, आर्थिक रूप से मजबूत अथवा दीर्घायुवान होते हैं। 

दशम भाव- यह जातक श्रेष्ठ बुद्धि वाले, सुख सुविधा संपन्न, परोपकार करने वाले, मित्र, पुत्र आदि से वियोग होने के कारण सदैव ग्लानि से युक्त, दान देने वाले, अभिमानी, कोमल हृदय वाले, स्त्रियों के प्रति रुचि, तेज से हीन अथवा आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं। 

एकादश भाव- इस प्रकार के जातकों की गायन में रुचि, समाज में प्रतिष्ठा, आर्थिक रूप से संपन्न, स्त्रियों में प्रेम रखने वाले, चंचल स्वभाव के, सात्विक, ज्ञानवान, रूपवान, यशस्वी और गुण संपन्न होते हैं। 

द्वादश भाव- इस प्रकार के जातक मंदबुद्धि वाले होते हैं, नेत्र से संबंधित रोग रहता है, व्यर्थ घूमने वाले, व्यर्थ खर्च करने वाले, संतान सुख से वंचित, धन से हीन, दुष्ट हृदय वाले, कामातुर, परस्त्री गमन करने वाले होते हैं।  

तो इस प्रकार से कुण्डली के समस्त भावों में सूर्य की उपस्थिति का प्रभाव अलग-अलग होता है।  

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