महामृत्युञ्जय मन्त्र के जप से मिलती है, हर बाधा से मुक्ति

महामृत्युञ्जय मन्त्र के जप से मिलती है, हर बाधा से मुक्ति

भगवान शिव के अनेक स्वरूप हैं, उनमें से भगवान शिव का एक रूप है महामृत्युंजय स्वरूप। जिसमें भगवान शिव अपने वरद हस्तों में अमृत रूपी कलश लेकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। भगवान भोले नाथ के इसी स्वरूप को महामृत्युञ्जय कहा जाता है। भगवान शिव के इस स्वरूप का स्तवन् महामृत्युञ्जय मन्त्र के द्वारा किया जाता है। महामृत्युञ्जय मन्त्र अर्थात् जो मृत्यु को भी टालने की क्षमता रखता है। यह मन्त्र इतना शक्तिसम्पन्न और प्रभावी है, कि वह न सिर्फ मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है, अपित सारे अनिष्टकारी ग्रहों को भी शान्त करता है। 

महामृत्युञ्जय मन्त्र किस प्रकार कार्य करता है 

भगवान भोलेनाथ का यह दिव्य मन्त्र का जप करने से भक्तों का शीघ्र ही कल्याण, आयु की रक्षा और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। इस मन्त्र का जप नियम पूर्वक करने से मन्त्र का प्रभाव शीघ्र ही होने लगता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुण्डली के दोषों को दूर करने के लिए महामृत्युञ्जय मन्त्र अमोघ कवच है। सम्पूर्ण विपदाओं को हरने के लिए यह जप, सर्वोत्तम उपाय है। 

विशेष- महामृत्युञ्जय मन्त्र के जप से नहीं रहता मृत्यु का भय, दूर होती हैं समस्त बाधाएं। 

पौराणिक कथा अनुसार मन्त्र का प्रभाव 

मार्कण्डेय पुराण में वर्णित कथा के अनुसार मृकण्डु ऋषि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। मृकण्डु ऋषि के विवाह को कई वर्ष बीत जाने के पश्चात् उन्हें कोई भी सन्तान प्राप्त नहीं हुआ। अतः उनको प्रतिदिन चिन्ता सताने लगी।  उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे उत्तम सन्तान प्राप्ति हेतु वरदान मांगा। भगवान शंकर ने पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया। परन्तु खुशी के साथ एक दु:ख भी दे दिया। भगवान शंकर ने कहा- हे ऋषिवर! आप जिस पुत्र की अभिलाषा कर रहे हैं, वह दिव्य गुणों से तो युक्त होगा, परन्तु वह अल्प आयु का ही होगा उसकी आयु मात्र 16 वर्ष की होगी। ऋषि ने सोचा कि गुणहीन, चरित्रहीन पुत्र होने से अच्छा तो गुणवान और चरित्रवान ही पुत्र सही है, भले ही वह अल्प आयु का ही हो। शिव जी के वरदान के प्रभाव से ऋषि को पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा। मार्कण्डेय जी के 15 वर्ष माता-पिता के साथ प्रसन्नता पूर्वक व्यतीत हो गए। ज्यों हीं 16वां वर्ष प्रारम्भ हुआ उनके माता-पिता की चिन्ता बढ़ने लगीं। माता-पिता को चिन्तित देखकर मार्कण्डेय जी ने उनसे चिन्ता का कारण पूछा। जब उन्होंने सब कुछ बता दिया तब मार्कण्डेय जी बोले आप लोग चिन्तित ना हों। मैं भगवान शिव को प्रसन्न करके मृत्यु को टाल दूंगा ऐसा वचन बोलकर वह जंगल की ओर चल दिए। वहां पर जाकर एक शिवलिंग की स्थापना की और भगवान शिव की महामृत्युञ्जय मन्त्र से उपासना प्रारम्भ कर दी। जब समय पूर्ण हुआ और यमराज उनके प्राण लेने आए तब वह उस शिवलिंग से लिपट गए और भगवान का स्तवन् करने लगे। इस प्रकार की तपस्या को देखकर भगवान शिव प्रसन्न होकर वहीं प्रकट हो गये और यमराज को वहां से यमपुरी वापस लौटने का आदेश दिया। भगवान शिव का आदेश शिरोधार्य करके यमराज वापस चले गये। शिवजी प्रसन्न होकर मार्कण्डेय जी को दीर्घायु का वरदान देकर अन्तर्ध्यान हो गये। 

महामृत्युञ्जय मन्त्र जप के नियम 

इस मन्त्र का जप सुबह और शाम दोनों समय कर सकते हैं संकट काल के समय इस मन्त्र का जप कभी भी कर सकते हैं, यह मन्त्र जप शिवलिंग अथवा शिव जी की प्रतिमा के समक्ष करना श्रेयस्कर है। इस मन्त्र का जप रुद्राक्ष की माला से करना चाहिए। 

महामृत्यञ्जय मन्त्र जप के लाभ 

  • अकालमृत्यु की सम्भावना नहीं रहती। 
  • असाध्य रोगों का नाश होता है। 
  • अनिष्टकारी ग्रहों की बाधा दूर होती है। 

तो इस प्रकार महामृत्यञ्जय मंत्र के प्रभाव से जातक के जीवन से समस्त कष्ट दूर होते हैं। यदि आप भी वैदिक विधि द्वारा महामृत्यञ्जय मंत्र जप करवाना चाहते हैं तो वैकुण्ठ आपकी सहायता कर सकता है। जिसके द्वारा वैदिक विधि विधान से समस्त पूजा, होम, जप एवं अनुष्ठान संपन्न करवाए जाते हैं।  

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