मानसिक शान्ति एवं संशयों की निवृत्ति हेतु करें परापूजा स्तोत्र पाठ

मानसिक शान्ति एवं संशयों की निवृत्ति हेतु करें परापूजा स्तोत्र पाठ

।। परा पूजा स्तोत्रम् ।।

श्रीमत्शंकराचार्यजी द्वारा विरचित इस स्तोत्र में दस श्लोक हैं जिनमें परब्रह्म परमात्मा जो नित्य है, अज्ञेय है, अविनाशी है, जो स्वच्छ निर्मल कान्ति वाला है, सभी का कल्याण करने वाला है, महर्षियों द्वारा जो वन्दनीय है, जिस परब्रह्म की उपासना हेतु किसी सामग्री की आवश्यकता नहीं है ऐसे परब्रह्म परमात्मा की स्तुति यहाँ की गयी है ।

अखण्डे सच्चिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि । 
स्थितेऽद्वितीयभावेऽस्मिन्कथं पूजा विधीयते ॥ १ ॥

अखण्ड, सच्चिदानन्द और निर्विकल्पैकरूप अद्वितीय भाव के स्थिर हो जाने पर, किस प्रकार पूजा किया जाए ? 

पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् ।
स्वच्छस्य पाद्यमर्घ्यं च शुद्धस्याचमनं कुतः ॥ २ ॥

जो पूर्ण है उसका आवाहन कहाँ किया जाय ? जो सबका आधार है, उसे आसन किस वस्तु का दें ? जो स्वच्छ है, उसको पाद्य और अर्घ्य कैसे दें ? और जो नित्य शुद्ध है, और जो नित्य शुद्ध है, उसको आचमन की क्या अपेक्षा ?

निर्मलस्य कुतः स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च । 
अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ॥ ३ ॥

निर्मल को स्नान कैसा ? सम्पूर्ण विश्व जिसके पेट में है, उसे वस्त्र कैसा ? और जो वर्ण तथा गोत्र से रहित है, उसके लिये यज्ञोपवीत कैसा ?  

निर्लेपस्य कुतो गन्धः पुष्पं निर्वासनस्य च ।
निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलङ्कारो निराकृतेः ॥ ४॥

निर्लेप को गन्ध कैसी ? निर्वासनिक को पुष्पों से क्या ? निर्विशेष को शोभा की क्या अपेक्षा और निराकार के लिये आभूषण क्या ? 

निरञ्जनस्य किं धूपैर्दीपैर्वा सर्वसाक्षिणः ।
निजानन्दैकतृप्तस्य नैवेद्यं किं भवेदिह ॥ ५ ॥

निरंजन को धूप से क्या ? सर्वसाक्षी को दीप कैसा तथा जो निजानन्दरूपी अमृत से तृप्त है, उसे नैवेद्य से क्या ?

विश्वानन्दपितुस्तस्य किं ताम्बूलं प्रकल्प्यते ।
स्वयंप्रकाशचिद्रूपो योऽसावर्कादिभासकः ॥ ६ ॥

जो स्वयंप्रकाश, चित्स्वरूप, सूर्य-चन्द्रादिका भी अवभासक और विश्व को आनन्दित करने वाला है, उसे ताम्बूल क्या समर्पण किया जाय ?

 प्रदक्षिणा ह्यनन्तस्य ह्यद्वयस्य कुतो नतिः ।
 वेदवाक्यैरवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते ॥ ७ ॥

अनन्त की परिक्रमा कैसी ? अद्वितीयको नमस्कार कैसा ? और जो वेदवाक्यों से भी जाना नहीं जा सकता, उसका स्तवन कैसे किया जाय ? 

स्वयंप्रकाशमानस्य कुतो नीराजनं विभो : ।
अन्तर्बहिश्च पूर्णस्य कथमुद्वासनं  भवेत् ॥ ८ ॥

जो स्वयंप्रकाश और विभु है, उसकी आरती कैसे की जाय ? तथा जो बाहर-भीतर सब ओर परिपूर्ण है, उसका विसर्जन कैसे 

एवमेव परापूजा सर्वावस्थासु सर्वदा ।
एकबुद्धया तु देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमैः ॥ ९॥

ब्रह्मवेत्ताओं को सर्वदा, सब अवस्थाओं में इसी प्रकार एक बुद्धि से भगवान्‌ की परापूजा करनी चाहिये ।

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं 
           पूजा ते विविधोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
           यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ १० ॥

हे शम्भो ! मेरी आत्मा ही तुम हो, बुद्धि श्रीपार्वतीजी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपकी कुटिया है, नाना प्रकारकी भोगसामग्री आपका पूजोपचार है, निद्रा समाधि है, मेरे चरणों का चलना आपकी प्रदक्षिणा है और मैं जो कुछ भी बोलता हूँ वह सब आपके स्तोत्र हैं, अधिक क्या ? मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है । 

।। इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं परापूजास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

वैदिक पद्धति से विशिष्ट पूजा-पाठ, यज्ञानुष्ठान, षोडश संस्कार, वैदिकसूक्ति पाठ, नवग्रह जप आदि के लिए हमारी साइट vaikunth.co पर जाएं तथा अभी बुक करें।
 

Vaikunth Blogs

सीमन्तोन्नयन संस्कार क्या है? जानें सही विधि एवं शुभ मुहूर्त
सीमन्तोन्नयन संस्कार क्या है? जानें सही विधि एवं शुभ मुहूर्त

भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रायः प्राचीन संस्कृति और संस्कारों का प्रभाव दृष्टिगोचर...

जरा,दुःख , व्याधि से निवृत्ति और शिव सायुज्य प्राप्ति हेतु करें इस स्तोत्र का पाठ
जरा,दुःख , व्याधि से निवृत्ति और शिव सायुज्य प्राप्ति हेतु करें इस स्तोत्र का पाठ

श्री शंकराचार्य जी द्वारा विरचित यह स्तोत्र है । इस स्तोत्र में कुल नौ श्लोक हैं जिनमें से आठ श्लोको...

Significance of 16 Sanskar in Hinduism
Significance of 16 Sanskar in Hinduism

Sanskar is a series of sacraments that goes way back to the Vedic times or even before. Sanskar is t...

संसार सागर से आसक्ति त्यागने एवं परमशान्ति की अनुभूति के लिए करें इस स्तोत्र का पाठ
संसार सागर से आसक्ति त्यागने एवं परमशान्ति की अनुभूति के लिए करें इस स्तोत्र का पाठ

श्री ब्रह्मानन्द जी द्वारा विरचित इस स्तोत्र में कुल 22 श्लोक हैं । भगवत् प्राप्ति हेतु यह स्तोत्र अ...

जन्म-मृत्यु के भय से निवृत्ति और सर्वविध कल्याण प्राप्ति हेतु करें श्री रामचन्द्राष्टकम्  स्तोत्र का पाठ
जन्म-मृत्यु के भय से निवृत्ति और सर्वविध कल्याण प्राप्ति हेतु करें श्री रामचन्द्राष्टकम् स्तोत्र का पाठ

परमपूज्य अमरदास जी द्वारा विरचित यह स्तोत्र है। जैसा की नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है की इस स्तोत्र...

समस्त पापों तथा विघ्नों की निवृत्ति और आसुरी बाधाओं से मुक्ति हेतु करें बलराम कवच का पाठ
समस्त पापों तथा विघ्नों की निवृत्ति और आसुरी बाधाओं से मुक्ति हेतु करें बलराम कवच का पाठ

बल अर्थात् ( ओजबल, तेजबल, बुद्धिबल, ज्ञानबल ) आदि के आकर श्रीबलराम जी हैं । इनका स्मरण परम माङ्गलिक...

 +91 |

By clicking on Login, I accept the Terms & Conditions and Privacy Policy

Recovery Account