सम्पूर्ण भौतिक बाधाओं की निवृत्ति तथा लक्ष्मी-पति की कृपा प्राप्ति हेतु करें कमलापत्यष्टक का पाठ

सम्पूर्ण भौतिक बाधाओं की निवृत्ति तथा लक्ष्मी-पति की कृपा प्राप्ति हेतु करें कमलापत्यष्टक का पाठ

श्रीमत्परमहंसस्वामीब्रह्मानन्द जी द्वारा विरचियत यह स्तोत्र  है इस स्तोत्र में नौ श्लोक हैं जिनमें से आठ श्लोकों में भगवान् विष्णु की स्तुति की गयी है और अन्तिम के एक श्लोक में स्तोत्र पाठ का माहात्मय बताया गया  है । कमला अर्थात् लक्ष्मी, पति अर्थात् स्वामी – भगवती लक्ष्मी के स्वामी भगवान् नारायण । नारायण, सभी भौतिक बाधाओं से अपने सेवक को मुक्ति प्रदान करने वाले हैं । जो भी मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करता है नारायण की कृपा से वह अवश्य ही नारायणलोक को प्राप्त करता है । 

भुजगतल्पगतं घनसुन्दरं गरुडवाहनमम्बुजलोचनम् ।
नलिनचक्रगदाकरमव्ययं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्।।१।।

रे मनुष्यो ! जो शेषशय्या पर पौढ़े हुए हैं, नीलमेघ-सदृश श्याम-सुन्दर हैं, गरुड़ जिनका वाहन है और जिनके कमल-जैसे नेत्र हैं, उन शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी अव्यय श्रीकमलापति को भजो (भजन करो ) ।

अलिकुलासितकोमलकुन्तलं विमलपीतदुकूलमनोहरम्।
जलधिजाङ्कितवामकलेवरं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्।।२।।

भौंरों के समान जिनकी काली-काली कोमल अलकें हैं, अतिनिर्मल सुन्दर पीताम्बर है और जिनके वामांक में श्रीलक्ष्मीजी सुशोभित हैं, रे मनुष्यो ! उन श्रीकमलापति को भजो ( भजन करो ) ।

किमु जपैश्च तपोभिरुताध्वरैरपि किमुत्तमतीर्थनिषेवणैः।
किमुत शास्त्रकदम्बविलोकनैर्भजत रे मनुजाः कमलापतिम्।।३।।

जप, तप, यज्ञ अथवा उत्तम-उत्तम तीर्थों के सेवन में क्या रखा है ? अथवा अधिक शास्त्रावलोकन के पचड़े में पड़ने से ही क्या होना है ? रे मनुष्यो ! बस श्रीकमलापति को ही भजो (भजन करो ) ।

मनुजदेहमिमं भुवि दुर्लभं समधिगम्य सुरैरपि वाञ्छितम्।
विषयलम्पटतामपहाय वै भजत रे मनुजाः कमलापतिम्।।४।।

इस संसार में यह मनुष्य-शरीर अतिदुर्लभ और देवगणों से भी वांछित है-ऐसा जानकर विषय-लम्पटता को त्याग कर रे मनुष्यो ! श्रीकमलापति को भजो (भजन करो ) ।

न वनिता न सुतो न सहोदरो न हि पिता जननी न च बान्धवः।
व्रजति साकमनेन जनेन वै भजत रे मनुजाः कमलापतिम्।।५।।

इस जीवके साथ स्त्री, पुत्र, भाई, पिता, माता और बन्धुजन कोई भी नहीं जाता, अतः रे मनुष्यो ! श्री कमलापति को भजो (भजन करो ) ।

सकलमेव चलं सचराचरं जगदिदं सुतरां धनयौवनम्।
समवलोक्य विवेकदृशा द्रुतं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्।।६।।

यह सचराचर जगत्, धन और यौवन सभी अत्यन्त अस्थिर हैं- ऐसा विवेकदृष्टि से देखकर रे मनुष्यो ! शीघ्र ही श्रीकमलापति को भजो (भजन करो ) ।

विविधरोगयुतं क्षणभंगुरं परवशं नवमार्गमलाकुलम्। 
परिनिरीक्ष्य शरीरंमिदं स्वकं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्।।७।।

यह शरीर नाना प्रकार के रोगों का आश्रय, क्षणिक, परवश तथा मल से भरे हुए नौ मार्गों वाला है-ऐसा देखकर रे मनुष्यो ! श्रीकमलापतिको भजो (भजन करो ) ।

मुनिवरैरनिशं हृदि भावितं शिवविरिञ्चिमहेन्द्रनुतं सदा।
मरणजन्मजराभयमोचनं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्।।८।।

मुनिजन जिनका अहर्निश हृदय में ध्यान करते हैं, शिव, ब्रह्मा तथा इन्द्रादि समस्त देवगण जिनकी सर्वदा वन्दना करते हैं तथा जो जरा, जन्म और मरणादि के भय को दूर करने वाले हैं, रे मनुष्यो ! उन श्री कमलापति को भजो (भजन करो ) ।

हरिपदाष्टकमेतदनुत्तमं परमहंसजनेन समीरितम्।
पठति यस्तु समाहितचेतसा व्रजति विष्णुपदं स नरो ध्रुवम्।।९।।

दास परमहंस द्वारा कहे गये इस अत्युत्तम भगवान् हरि के अष्टक को जो मनुष्य समाहितचित्त से पढ़ता है, वह अवश्य ही भगवान् विष्णु के परमधाम को प्राप्त होता है।

“इस प्रकार श्रीमत्परमहंसस्वामीब्रह्मानन्द जी द्वारा विरचित “कमलापत्यष्टकम्” सम्पूर्ण हुआ ।।

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