कायिक, वाचिक, मानसिक तथा सांसर्गिक चतुर्विध पापों की शान्ति हेतु करें इस नाम स्तोत्र का पाठ

कायिक, वाचिक, मानसिक तथा सांसर्गिक चतुर्विध पापों की शान्ति हेतु करें इस नाम स्तोत्र का पाठ

श्रीमद्भागवत के अनुसार- भगवन्नाम का संकीर्तन किसी भी स्थिति में किया जाए वह सर्वथा सुखदायी होता है । नाम संकीर्तन मानव के समस्त दुःख-दारिद्रय और पापों को भी नष्ट करता है । नाम संकीर्तन बाह्यशुद्धि के साथ ही आंतरिक दोषों यथा - दम्भ,काम,क्रोध, द्वेष,लोभ,मोह,ईर्ष्या, आदि को भी समाप्त कर देता है । इस स्तोत्र में सात श्लोकों के माध्यम से भगवान्नाम का संकीर्तन किया गया है । 

किं नु नाम सहस्त्राणि जपते च पुनः पुनः। 
यानि नामानि दिव्यानि तानि चाचक्ष्व केशव ॥१॥

अर्जुन ने भगवान् कृष्ण जी से पूछा की हे केशव ! मनुष्य पुनः-पुनः  एक सहस्र ( हजार )  नामों का जप क्यों करता है ? आपके जो दिव्य नाम हों, उनका वर्णन कीजिये ।

मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् । 
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ॥ २ ॥

भगवान् श्री कृष्ण जी अर्जुन से बोलते है, हे अर्जुन ! मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन, जनार्दन, गोविन्द, पुण्डरीकाक्ष, माधव, मधुसूदन, -

पद्मनाभं सहस्त्राक्षं वनमालिं  हलायुधम् । 
गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥३॥

पद्मनाभ, सहस्त्राक्ष, वनमाली, हलायुध, गोवर्धन, हृषीकेश, वैकुण्ठ, पुरुषोत्तम -                 

विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।  
दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्गं गरुडध्वजम् ॥४॥

विश्वरूप, वासुदेव, राम, नारायण, हरि, दामोदर, श्रीधर, वेदाङ्ग, गरुडध्वज –

अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् । 
गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ।।५।।

अनन्त और कृष्णगोपाल- इन नामों का जप करने वाले मनुष्य के भीतर पाप नहीं रहता । वह एक करोड़ गो-दान, एक सौ अश्वमेधयज्ञ तथा -

कन्यादानसहस्त्राणां फलं प्राप्नोति मानवः । 
अमायां वा पौर्णमास्यामेकादश्यां तथैव च ।।६।।

सन्ध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रातःकाले तथैव च । 
मध्याहने च जपन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।७।।

एक हजार कन्यादान का फल प्राप्त करता है । अमावस्या, पूर्णिमा तथा एकादशी तिथि को जो प्रतिदिन सायं- प्रातःकाल एवं मध्याह्न के समय इन नामों का स्मरणपूर्वक जप करता है वह  साधक सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है । 

।। इस प्रकार श्री कृष्णार्जुन संवाद में “श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रम्” सम्पूर्ण हुआ ।।

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