जानें स्कन्दषष्ठी का पूजन-अर्चन तथा माहात्म्य

जानें स्कन्दषष्ठी का पूजन-अर्चन तथा माहात्म्य

।। स्कन्द षष्ठी व्रत ।।

कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द षष्ठी का व्रत किया जाता है । भगवान् कार्तिकेय की पूजा के लिए प्रत्येक माह की षष्ठी तिथि के दिन स्कंद षष्ठी व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान् कार्तिकेय की पूजा करने से सुख-समृद्धि, सौभाग्य और सफलता की प्राप्ति होती है।

स्कंद षष्ठी को संतान षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है । किंचित जन आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द षष्ठी मानते हैं। स्कंदपुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति और संतान की पीड़ाओं का शमन करने वाले इस व्रत का विधान बताया गया है। एक दिन पूर्व से उपवास करके षष्ठी को कुमार अर्थात् कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए ।

पूजन विधि :

  • स्कंद षष्ठी के अवसर पर भगवान् शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है ।
  • स्कन्द देव (कार्तिकेय) की स्थापना करके पूजा की जाती है तथा अखंड दीपक जलाए जाते हैं ।
  • भक्तों द्वारा स्कंद षष्ठी माहात्म्य का नित्य पाठ किया जाता है।
  • भगवान् को स्नान कराया जाता है, नए वस्त्र धारण कराए जाते हैं तथा पूजा की जाती है। 
  • इस दिन भगवान् को भोग लगाते हैं, विशेष कार्य की सिद्धि के लिए इस समय की गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी होती है । 
  • इसमें साधक तंत्र साधना भी करते हैं ।

स्कंद षष्ठी की पवित्र व्रत कथा :

कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में प्राप्त होता है । जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा । राक्षसों के द्वारा हो रहे निरन्तर आतंक से सभी देवतागण परेशान थे । ऐसी स्थिति में सभी देवताओं ने एकत्रित होकर परमपिता ब्रह्मा से मदद की गुहार की । देवताओं ने अपनी समस्या का सम्पूर्ण वृतान्त ब्रह्माजी को बताया । देवताओं द्वारा बताये गए समस्त वृत्तान्त को सुनकर ब्रह्माजी ने कहा - कि भगवान् शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, लेकिन उस काल चक्र में माता सती के वियोग में भगवान् शिव समाधि में लीन थे। ऐसे में इन्द्र और सभी देवताओं ने भगवान् शिव को समाधि से जगाने के लिए कामदेव की सहायता ली । जिसके बाद कामदेव ने स्वयं भस्म होकर भगवान् भोलेनाथ की तपस्या को भंग कर दिया और फिर भगवान् शिव ने माता पार्वती से विवाह किया । विवाह के बाद दोनों देवदारु वन में एकान्तवास के लिए चले गए । उस वक्त भगवान् शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे । उसी समय एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान् शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह कबूतर भगवान् शिव के तेज को सह नहीं पाया और भागीरथी को सौंप दिया । गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे छः (06) बालकों का जन्म हुआ । यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए । इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ ।

भगवान् स्कन्द की विशेषता :

भगवान् स्कन्द शक्ति के अधिदेव हैं, देवताओं ने इन्हें अपना सेनापतित्व प्रदान किया । मयूर पर आसीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत मे सबसे ज्यादा की जाती है । यदक्षिण में भगवान् कार्तिकेय 'मुरुगन' नाम से विख्यात हैं। प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन सभी कुछ इनकी कृपा से सम्पन्न होते हैं । स्कन्दपुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय ही हैं तथा यह पुराण सभी पुराणों में सबसे विशाल पुराण है।

भगवान् स्कन्द, हिंदू धर्म के प्रमुख देवों में से एक हैं । इन्हें स्कंद, कार्तिकेय और मुरुगन नामों से भी जाता है । दक्षिण भारत में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक भगवान् कार्तिकेय शिव और पार्वती के पुत्र हैं। भगवान् कार्तिकेय के अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा मुख्यतः भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिलनाडु में होती है। इसलिए भगवान् स्कंद के सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडू में ही स्थित हैं ।

स्कन्द षष्ठी व्रत का माहात्म्य :

  • इस दिन भगवान् कार्तिकेय का पूजन करने से रोग, राग, दुःख और दरिद्रता का निवारण होता है । 
  • भगवान् कार्तिकेय के पूजन से प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है । 
  • पौराणिक शास्त्रों के अनुसार स्कंद षष्ठी के दिन स्वामी कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध किया था, इसलिए इस दिन भगवान् कार्तिकेय के पूजन से जीवन में उच्च योग के लक्षणों की प्राप्ति होती है। 
  • धार्मिक शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि स्कंद षष्ठी का व्रत करने से काम, क्रोध, मद, मोह, अहंकार से मुक्ति मिलती है और सन्मार्ग की प्राप्ति होती है। 
  • पुराणों में वर्णन मिलता है कि भगवान् विष्णु ने माया मोह में पड़े नारद जी का इसी दिन उद्धार करते हुए लोभ से मुक्ति प्रदान की । 
  • इस दिन कार्तिकेय के साथ भगवान् श्री‍हरि विष्णुजी के पूजन का विशेष महत्व माना गया है। 
  • इस व्रत से नि:संतान दम्पतियों को संतान की प्राप्ति तथा सफलता, सुख-समृद्धि, वैभव प्राप्त होता है । 
  • दरिद्रता-दु:ख का निवारण होता है तथा जीवन में धन-ऐश्वर्य प्राप्त होता है । 

इस प्रकार “स्कन्द षष्ठी” व्रत की सम्पूर्ण विधि और व्रत का माहात्म्य बतलाया गया । इस प्रकार विधिपूर्वक स्कन्द षष्ठी व्रत की कथा सम्पूर्ण हुई ।  

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