छठे माह में अन्नप्राशन संस्कार का महत्व

छठे माह में अन्नप्राशन संस्कार का महत्व

शिशु के जन्म के पश्चात् छ: महीने तक वह माता के दुग्ध पर आश्रित रहता है और छठे महीने में अन्नप्राशन संस्कार करते हुए शिशु को अन्न खिलाया जाता है, जिसे अन्नप्राशन संस्कार कहते हैं। इस अवधि से पूर्व शिशु का पाचन तंत्र अत्यंत दुर्बल होता है तथा दांत भी नहीं होते हैं, जिसके कारण शिशु को पहले अन्न खिलाने पर उसका स्वास्थ्य बिगड़ सकता है। यद्यपि बहुत से शिशुओं के लिए उनकी माता का दूध पर्याप्त नहीं होता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसे अन्न या किसी भी प्रकार का व्यंजन खिलाया जाए, विपरीत इसके शिशु के लिए दूध पर्याप्त नहीं होने पर उसकी पाचन शक्ति के अनुरूप उसे गाय का या बकरी का दूध पिलाया जाता है, जो उसके स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी बालक को छ: महीने होने पर अन्न खिलाया जाता है, लेकिन छ: महीने में अन्नप्राशन संस्कार का व्याख्यान हमारे शास्त्रों में बहुत पहले से मिलता है।  

अन्नप्राशन संस्कार का महत्व 

जैसा अन्न वैसा मन, जैसा मन वैसा आचरण, अर्थात् जो प्राणी जिस प्रकार का अन्न ग्रहण करता है, उसका प्रभाव उसके मानसिक एवं शारीरिक रूप में देखने को मिलता है। अन्नप्राशन संस्कार में बालक को पेय से अन्न में लाने की प्रक्रिया होती है और इस प्रक्रिया के द्वारा शिशु पहली बार अन्न ग्रहण करता है। इसलिए उसे सर्वप्रथम दूध एवं चावल की खीर खिलाई जाती है। जिस प्रकार से सात्विक आहार ग्रहण करने वाला व्यक्ति रोग मुक्त रहता है और मानसिक रूप से शक्तिशाली एवं बुद्धिमान होता है, ठीक इसी प्रकार से तासमिक आहार खाने वाले व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ‘आहार शुद्धौ सत्वशुद्धि: सत्वशुद्धौ ध्रुवास्मृति:’  

शुद्ध आहार ग्रहण करने से मन, वचन एवं कर्म में सात्विक भाव उत्पन्न होते हैं और स्मृति शक्ति स्थिर होती है। जो प्रथम अन्न शिशु को चखाया जाता है, वह सात्विक हो तथा मंत्रों के द्वारा अभिमंत्रित करना आवश्यक होता है।  

छठे माह में अन्नप्राशन संस्कार करना चाहिए, ऐसा हमारे शास्त्र कहते हैं, षष्ठे मासेऽन्नप्राशनम्- पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार शिशु को छठे महीने में अन्नप्राशन कराना चाहिए। व्यास स्मृति में भी यही कहा है- "षष्ठेमास्यन्नमश्नीयात्" अर्थात् छठवें महीने में शिशु का अन्नप्राशन करें। 

अन्नस्य सूक्ष्मभागेन विकासो मनसा भवेत्। 

अतो न्यायादर्जनं कुर्योच्चामलं सत्क्रियादिभि:।। 

अर्थात्, अन्न के सूक्ष्म भाग से सात्विक मन का निर्माण एवं विकास होता है। इसलिए अन्न को न्यायपूर्वक अर्जन करें एवं सात्विक क्रिया के साथ पवित्र भाव से उसे ग्रहण करें।  

अन्नप्राशन संस्कार में चांदी की चम्मच से खिलाया जाता है अन्न 

अन्नप्राशन में शिशु को सर्वप्रथम चांदी अथवा सोने की चम्मच से खीर चखाई जाती है। खीर में मधु, तुलसी, गंगाजल एंव घृत मिलाया जाता है, क्योंकि ये सभी पदार्थ रोगनाशक एवं पौष्टिकता से भरपूर होते हैं। इसके पूर्व चम्मच का पूजन किया जाता है। अन्नप्राशन संस्कार में चांदी का उपयोग इसलिए किया जाता है, क्योंकि यह सभी धातुओं में सबसे पवित्र मानी जाती है और इससे सात्विकता आती है। 

अन्नप्राशन में ध्यान देने योग्य बातें- 

शिशु को ऐसी वस्तुओं एवं आहार का सेवन कदाचित नहीं करवाना चाहिए, जो उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालें, जैसे- मिर्च मसाले, नशीले पदार्थ, चटपटे पकवान, तमोगुणी एवं रोजगुणी आदि आहार का सेवन नहीं करवाना चाहिए, इससे बालक के कोमल शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। 

अन्नप्राशन संस्कार के लिए विशेष सामग्री 

  • अन्नप्राशन संस्कार में शिशु को खिलाने के लिए चावल की खीर, धी, शहद, तुलसी एवं गंगाजल की व्यवस्था कर लेनी चाहिए।  
  • चांदी की कटोरी या चम्मच।  

क्यों किया जाता है अन्नप्राशन संस्कार 

  • अन्नप्राशन संस्कार के द्वारा माता के गर्भ में, जो भी शिशु का आहार दोष होता है वह दूर होता है।  
  • बालक को पेय से अन्न में लाने के लिए सर्वप्रथम चावल एवं दूध से बनी खीर दी जाती है, जिससे उसका शरीर अन्तःकरण निर्मल एवं दोष रहित होता है। 
  • अन्नप्राशन संस्कार में सर्वप्रथम हवन संपन्न किया जाता है तथा पवित्र हविष्यान्न, मधु एवं घृत युक्त खीर आदि शिशु को खिलाई जाती है। 
  • छठे माह से पूर्व शिशु केवल माता के दूध पर ही निर्भर रहता है, लेकिन छठे माह के बाद यह शिशु के लिए पर्याप्त नहीं होता,  जिसके लिए शिशु को ठोस आहार की आवश्यकता होती है और वैदिक विधि द्वारा अन्नप्राशन संस्कार संपन्न किया जाता है।  
  • अन्नप्राशन संस्कार से बालक का शारीरिक विकास होता है एवं तेज में वृद्धि होती है।  
  • अन्नप्राशन संस्कार से बालक स्वावलंबी बनता है। 

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