समावर्तन

समावर्तन संस्कार

संस्कार | Duration : 4 Hours
Price : 7100

About Puja

           यज्ञोपवीत संस्कार के बाद  वेदारम्भ संस्कार तथा जब शिक्षा पूर्ण हो जाती थी, तो ब्रह्मचारी गुरु आज्ञा से स्नात होता था, ब्रह्मचर्य के चिन्हो का त्याग करता था,और स्नानादि के पश्चात् पुष्पमाला वस्त्रालङ्कार धारण कर यज्ञोपवीत संस्कार में जिस क्रिया का निषेध किया गया था यथा दर्पण, सूरमा, छाता, जूता आदि। ये सब आचार्य आज्ञा से धारण करता है। समावर्तन का अर्थ है, गुरुकुल से शिक्षा ग्रहण कर पुनः घर में अगमन करना। यह शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् दीक्षान्त संस्कार है। इस संस्कार में वेदाध्ययन की पूर्णता तथा विवाह के पश्चात् गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का अधिकार प्राप्त होता है। विद्या अध्ययन के बाद ब्रह्मचारी की स्नातक संज्ञा हो जाती है। स्नातक अर्थात् ज्ञानगङ्गा या वेदगङ्गा में स्नान किया हुआ। वेद भगवान् कहते हैं - 'आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः' अर्थात् आचार्य को सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर सन्तान परम्परा की रक्षा के लिए स्नातक, गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे।समावर्तन संस्कार ,वेदारम्भ के द्वितीय दिन करना श्रेयस्कर होता है ।
           यद्यपि वर्तमान समाज में यज्ञोपवीत,वेदारम्भ एवं समावर्तन ये तीनों संस्कार एक साथ किये जा रहे हैं , लेकिन समस्त विधियों को कराने के लिए तीनों संस्कार तीन दिन में करानी चाहिए। सर्वोत्तम विधि यही है।

 सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
     पुत्र ! तुम सदा सत्य भाषण करना, आपत्ति पड़नेपर भी झूठका कदापि आश्रय न लेना; अपने वर्ण-आश्रमके अनुकूल शास्त्रसम्मत धर्मका अनुष्ठान करना; स्वाध्यायसे अर्थात् वेदोंके अभ्यास, सन्ध्यावन्दन, गायत्रीजप और भगवन्नाम-गुणकीर्तन आदि नित्यकर्ममें कभी भी प्रमाद न करना —अर्थात् न तो कभी उन्हें अनादरपूर्वक करना और न आलस्यवश उनका त्याग ही करना। गुरुके लिये दक्षिणाके रूपमें उनकी रुचिके अनुरूप धन लाकर प्रेमपूर्वक देना; फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके स्वधर्मका पालन करते हुए संतान - परम्पराको सुरक्षित रखना —उसका लोप न करना। अर्थात् शास्त्रविधि अनुसार विवाहित धर्मपत्नीके साथ ऋतुकालमें नियमित सहवास करके संतानोत्पत्तिका कार्य अनासक्तिपूर्वक करना। तुमको कभी भी सत्यसे नहीं चूकना चाहिये अर्थात् हँसी -दिल्लगी या व्यर्थकी बातोंमें वाणीकी शक्तिको न तो नष्ट करना चाहिये और न परिहास आदिके बहाने कभी झूठ ही बोलना चाहिये। इसी प्रकार धर्मपालनमें भी भूल नहीं करना चाहिये अर्थात् कोई बहाना बनाकर या आलस्यवश कभी धर्मकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। लौकिक और शास्त्रीय -जितने भी कर्तव्यरूपसे प्राप्त शुभ कर्म हैं, उनका कभी त्याग या उनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, अपितु यथायोग्य उनका अनुष्ठान करते रहना चाहिये। धन-सम्पत्तिको बढ़ानेवाले लौकिक उन्नतिके साधनोंके प्रति कभी उदासीन नहीं होना चाहिये। इसके लिये भी वर्णाश्रमानुकूल चेष्टा करनी चाहिये। पढ़ने और पढ़ानेका जो मुख्य नियम है, उसकी कभी अवहेलना या आलस्यपूर्वक त्याग नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार अग्निहोत्र और यज्ञादिके अनुष्ठानरूप देवकार्य तथा श्राद्ध-तर्पण आदि पितृकार्यके सम्पादनमें भी आलस्य या अवहेलनापूर्वक प्रमाद नहीं करना चाहिये।

   मातृदेवो भव । पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि । नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयां सो ब्राह्मणाः तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयादेयम् । श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्।

      पुत्र ! तुम मातामें देवबुद्धि रखना, पितामें भी देवबुद्धि रखना, आचार्यमें देवबुद्धि रखना तथा अतिथिमें भी देवबुद्धि रखना। आशय यह कि इन चारोंको ईश्वरकी प्रतिमूर्ति समझकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदा इनकी आज्ञाका पालन, नमस्कार और सेवा करते रहना; इन्हें सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहारसे प्रसन्न रखना । जगत् में जो -जो निर्दोष कर्म हैं, उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये। उनसे भिन्न दोषयुक्त-निषिद्ध कर्म हैं, उनका कभी भूलकर-स्वप्नमें भी आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे-अपने गुरुजनोंके आचार- व्यवहारमें भी जो उत्तम (शास्त्र एवं शिष्ट पुरुषोंद्वारा अनुमोदित) आचरण हैं, जिनके विषयमें किसी प्रकारकी शंकाको स्थान नहीं है, उन्हींका तुम्हें अनुकरण करना चाहिये, उन्हींका सेवन करना चाहिये। जिनके विषयमें जरा-सी शंका हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ-वय, विद्या, तप, आचरण आदिमें बड़े तथा ब्राह्मण आदि पूज्य पुरुष घरपर पधारें, उनको पाद्य, अर्घ्य, आसन आदि प्रदान करके सब प्रकारसे उनका सम्मान तथा यथायोग्य सेवा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेके लिये तुम्हें सदा उदारतापूर्वक तत्पर रहना चाहिये। जो कुछ भी दिया जाय, वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि बिना श्रद्धाके किये हुए दान आदि कर्म असत् माने गये हैं (गीता १७।२७) । लज्जापूर्वक देना चाहिये। अर्थात् सारा धन भगवान् का है, मैंने इसे अपना मानकर उनका अपराध किया है। इसे सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित भगवान्‌की सेवामें ही लगाना उचित था, मैंने ऐसा नहीं किया। मैं जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी बहुत कम है। यों सोचकर संकोचका अनुभव करते हुए देना चाहिये । मनमें दानीपनके अभिमानको नहीं आने देना चाहिये। सर्वत्र और सबमें भगवान् हैं, अत: दान लेनेवाले भी भगवान् ही हैं। उनकी बड़ी कृपा है कि मेरा दान स्वीकार कर रहे हैं। यों विचारकर भगवान् से भय मानते हुए दान देना चाहिये। 'हम किसीका उपकार कर रहे हैं' ऐसी भावना मनमें लाकर अभिमान या अविनय नहीं प्रकट करना चाहिये। परंतु जो कुछ दिया जाय —वह विवेकपूर्वक, उसके परिणामको समझकर निष्कामभावसे कर्तव्य समझकर देना चाहिये (गीता १७/२०) । इस प्रकार दिया हुआ दान ही भगवान् की प्रीतिका - कल्याणका साधन हो सकता है। वही अक्षय फलका देनेवाला है।

    अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम् ।

    यह सब करते हुए भी यदि तुमको किसी अवसरपर अपना कर्तव्य निश्चित करनेमें दुविधा उत्पन्न हो जाय, अपनी बुद्धिसे किसी एक निश्चयपर पहुँचना कठिन हो जाय - तुम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाओ, तो ऐसी स्थितिमें वहाँ जो कोई उत्तम विचार रखनेवाले, उचित परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें तत्परतापूर्वक लगे हुए, सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करनेवाले तथा एकमात्र धर्म- पालनकी ही इच्छा रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मण (या अन्य कोई वैसे ही महापुरुष) हों - वे जिस प्रकार ऐसे प्रसंगों पर आचरण करते हों, उसी प्रकारका आचरण तुम्हें भी करना चाहिये। ऐसे स्थलोंमें उन्हींके सत्परामर्शके अनुसार उन्हींके स्थापित आदर्शका अनुकरण चाहिये। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य किसी दोषके कारण लांछित हो गया हो, उसके साथ किस समय कैसा व्यवहार करना चाहिये-इस विषयमें भी यदि तुमको दुविधा प्राप्त हो जाय - तुम अपनी बुद्धिसे निर्णय न कर सको तो वहाँ भी जो विचारशील, परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें पूर्णतया संलग्न तथा धर्मकामी (सांसारिक धनादिकी कामनासे रहित) निःस्वार्थी विद्वान् ब्राह्मण हों, वे लोग उसके साथ जैसा व्यवहार करें, वैसा ही तुमको भी करना चाहिये। उनका व्यवहार ही इस विषयमें प्रमाण है। 
        यही शास्त्रकी आज्ञा है — शास्त्रोंका निचोड़ है। यही गुरु एवं माता-पिताका अपने शिष्यों और संतानोंके प्रति उपदेश है तथा यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। इतना ही नहीं, अनुशासन भी यही है। ईश्वरकी आज्ञा तथा परम्परागत उपदेशका नाम अनुशासन है। इसलिये तुमको इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिए।

Benefits

समावर्तन संस्कार से वटुक पर होने वाला विशेष प्रभाव , लाभ और माहात्म्य :-

   समावर्तन संस्कार में जो स्नातक को गुरुद्वारा उपदेश दिया जाता है, वह सबसे प्रमुख है- यह उपदेश तैत्तिरीयोपनिषद् की शिक्षावल्ली में उद्धृत् है। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके कैसे जीवन यापन करना चाहिए। इसका बड़ा ही तात्विक विवेचन प्राप्त होता है जो दीक्षान्त उपदेश कहलाता है।

Process

समावर्तन संस्कार में  होने वाले प्रयोग या विधि:-

  1. स्वस्तिवाचन एवं शान्तिपाठ
  2. प्रतिज्ञा सङ्कल्प
  3. गणपति गौरी पूजन
  4. कलश स्थापन एवं वरुणादि देवताओं का पूजन
  5. पुण्याहवाचन एवं मन्त्रोच्चारण अभिषेक
  6. षोडशमातृका पूजन
  7. सप्तघृतमातृका पूजन
  8. आयुष्यमन्त्रपाठ
  9. सांकल्पिक नान्दीमुखश्राद्ध  (आभ्युदयिकश्राद्ध)
  10. नवग्रह मण्डल पूजन
  11. अधिदेवता, प्रत्यधिदेवता आवाहन एवं पूजन
  12. पञ्चलोकपाल,दशदिक्पाल, वास्तु पुरुष आवाहन एवं पूजन 
  13. रक्षाविधान आदि
  14. गोदान सङ्कल्प
  15. अग्निस्थापन (वैश्वानर अग्नि)
  16. ब्रह्मावरण
  17. कुशकण्डिका
  18. अग्नि प्रतिष्ठा
  19. अग्निध्यान
  20. हवनविधि
  21. त्र्यायुष्यकरण
  22. अग्नि और आचार्य का  अभिवादन
  23. आशीर्वाद
  24. आठ कलशों के जल से अभिषेक विधि
  25. दण्ड और मृगचर्म का त्याग
  26. सूर्योपस्थान
  27. दन्तधावन नासिका आदि का स्पर्श
  28. पितरों के निमित्त जलाञ्जलि
  29. सविता देवता की प्रार्थना
  30. नूतन वस्त्र धारण यज्ञोपवीत धारण
  31. उत्तरीय वस्त्रधारण
  32. अलङ्कार आदिधारण
  33. पगड़ी धारण
  34. कर्णालंकार धारण
  35. अञ्जनधारण
  36. दर्पण में मुखावलोकन
  37. छत्र धारण
  38. उपानह धारण
  39. दण्डधारण
  40. आचार्य के लिए गोदान
  41. स्नातक के सामान्य नियम
  42. पूर्णाहुति
  43. दक्षिणा दान
  44. ब्राह्मण भोजन संकल्प
  45. भूयसी दक्षिणा सङ्कल्प
  46. विष्णु स्मरण
  47. महानीराजन और तिलक करण

Puja Samagri

समावर्तन संस्कार  पूजन सामग्री:-

टिप्पणी:-यज्ञोपवीत संस्कार की ही सामग्री से वेदाध्ययन संस्कार एवं समावर्तन संस्कार भी पूर्ण हो जायेगा ।

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