त्रिविध दुखों से निवृत्ति एवं शिव सायुज्य प्राप्ति हेतु करें लिङ्गाष्टकम् का पाठ

त्रिविध दुखों से निवृत्ति एवं शिव सायुज्य प्राप्ति हेतु करें लिङ्गाष्टकम् का पाठ

यह  स्तोत्र भगवान् शिव को समर्पित एक प्रार्थना है । इस स्तोत्र में कुल नौ श्लोक हैं जिनमें से आठ श्लोकों में भगवान् आशुतोष से प्रार्थना की गयी है और अन्तिम के एक श्लोक में स्तोत्र पाठ का माहात्म्य बताया गया है । शिवलिंग, जो की भगवान् आशुतोष (शिव) का परिचायक है, उसकी महिमा गाई गयी  है । शिवलिंग में ही ब्रह्मा, विष्णु, एवं समस्त देवी-देवता निवास करते हैं । इसलिए शिवलिंग की आराधना करने मात्र से मनुष्य को समस्त कष्टों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है और उस मनुष्य को निश्चित ही शिवलोक (कैलास) की प्राप्ति होती है । 

ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्। 
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ १॥

जो लिंग (स्वरूप) ब्रह्मा, विष्णु एवं समस्त देवगणों द्वारा पूजित तथा निर्मल कान्ति से सुशोभित है और जो लिंग जन्मजन्य दुःख का विनाशक अर्थात् मोक्ष प्रदायक है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ॥

देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम्।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ २॥

जो शिवलिंग श्रेष्ठ देवगण एवं ऋषि-प्रवरों द्वारा पूजित, कामदेव को नष्ट करने वाला, करुणा का भण्डार,रावण के घमण्ड को नष्ट करने वाला है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ ॥

सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३।।

जो लिंग सभी दिव्य सुगन्धि (अगर-तगर-चन्दन आदि)- से सुलेपित, 'ज्ञानमिच्छेत्तु शङ्करात्' इस उक्ति द्वारा बुद्धि-वृद्धि कारक, समस्त सिद्ध, देवता एवं असुर गणों से वन्दित है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ ॥

कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ४॥

साम्ब सदाशिव का लिंग रूप विग्रह सुवर्ण, माणिक्यादि महामणियों से विभूषित तथा नागराज द्वारा वेष्टित (लिपटे) होने से अत्यन्त सुशोभित है और (अपने श्वसुर) दक्ष-यज्ञ का विनाशक है, उस सदा शिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ ॥

कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥ ५ ॥

सदाशिव का लिंगरूप विग्रह (शरीर) कुंकुम, चन्दन आदि से लिम्पित (पुता हुआ), दिव्य कमल की माला से सुशोभित और अनेक जन्म-जन्मान्तर के संचित पाप को नष्ट करने वाला है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ ॥

देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ६॥

भाव भक्ति द्वारा समस्त देवगणों से पूजित एवं सेवित, करोड़ों सूर्यों की प्रखर कान्ति से युक्त उस भगवान् सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ॥ 

अष्टदलोपरि वेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्। 
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ७॥

अष्टदल कमल से वेष्टित सदाशिव का लिंगरूप विग्रह सभी चराचर (स्थावर-जंगम)-की उत्पत्ति का कारण भूत एवं अष्ट दरिद्रों का विनाशक है, उस सदा शिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ 

सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम्। 
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥

जो लिंग देवगुरु बृहस्पति एवं देवश्रेष्ठ इन्द्रादि के द्वारा पूजित, निरन्तर नन्दनवन के दिव्य पुष्पों द्वारा अर्चित, परात्पर एवं परमात्मस्व रूप है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ 

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यःपठेच्छिवसन्निधौ । 
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥ ९ ॥

जो साम्ब सदाशिव के समीप पुण्यकारी इस 'लिंगाष्टक' का पाठ करता है, वह निश्चित ही शिवलोक (कैलास) - में निवास करता है तथा शिवके साथ रहते हुए अत्यन्त प्रसन्न होता है ॥ ९ ॥

 “इस प्रकार लिंगाष्टकम् स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ” ।

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