जानें, क्यों आवश्यक है नामकरण संस्कार

जानें, क्यों आवश्यक है नामकरण संस्कार

प्रायः हम देखते हैं की इस चर–अचर संसार में जितनी भी वस्तुएं हैं, प्रत्येक वस्तु की अपनी विशिष्ट पहचान है, जिस कारण हम उस सजीव या निर्जीव वस्तु का ज्ञान कर पाते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य का कोई न कोई स्वरूप या नाम अवश्य होता है, बिना नाम के किसी वस्तु या व्यक्ति की पहचान नहीं की जा सकती है, अतः व्यवहार सिद्धि, चाहे किसी वस्तु की हो या मनुष्य की, नाम के बिना संभव नहीं है। जिस प्रकार हम देखते हैं कि, लौकिक जगत में जब हम किसी अनजान व्यक्ति से मिलते हैं तो सर्वप्रथम उस व्यक्ति से उसका नाम पूछते हैं, क्योंकि नाम के बिना हम किसी को नहीं जान सकते हैं, परिचय की प्रक्रिया नाम से ही प्रारम्भ होती है, इस प्रकार हम व्यक्ति के बारे में जान पाते हैं, व्यक्तिगत दृष्टिकोण से यदि हम यह सोचें की यदि किसी वस्तु या व्यक्ति का नाम ही नहीं होता तो उसकी पहचान किस प्रकार होती। अतः नाम की महिमा अत्यन्त व्यापक है क्योंकि नाम की महिमा से अगुण-अगोचर स्वरूप वाला परमात्मा भी सगुण–साकार हो जाता है और ईश्वर का तो अनन्त नाम और स्वरूप हैं। 

आचार्य बृहस्पति नाम के विषय में बताते हैं कि नाम सम्पूर्ण सृष्टि में व्यवहार एवं मंगलमय कार्यों का हेतु है। नाम की महिमा से ही व्यक्ति सम्पूर्ण संसार में कीर्ति, यश और ख्याति प्राप्त करता है। इसलिए शास्त्रों ने नामकरण संस्कार को वैदिक प्रक्रिया से सम्पादित करना अनिवार्य माना गया है।  

  “नामाखिलस्य व्यवहारहेतुः शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतुः । 

 नाम्नैव कीर्ति लभते मनुष्यस्ततः प्रशस्तं खलु नामकर्म” ।। 

                                              ( वीरमित्रोदय- संस्कार प्रकाश ) 

प्राचीन काल से ही भगवान और संतों के नाम की तो इतनी महिमा बताई गयी है कि नाम जप मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है, अर्थात् अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। मनुष्य से अधिक उसके नाम की महिमा है, इसलिए सोलह संस्कारों के अंतर्गत नामकरण संस्कार की महत्ता को प्रतिपादित किया गया।  

नामकरण संस्कार का महत्व :-  

व्यवहार की सिद्धि, आयु एवं ओज की वृद्धि के लिए नामकरण संस्कार करना अति आवश्यक हो  जाता है।   

आयुर्वर्चोऽभिवृद्धिश्च, सिद्धिर्व्यवहृतेस्तथा। 

 नामकर्मफलं त्वेतत्, समुद्दिष्टं मनीषिभिः।|  

नामकरण संस्कार कब करें ?  

इस विषय से सम्बंधित गृहयसूत्र में आचार्य पारस्कर लिखते हैं - दशम्यामुत्थाप्य ब्राह्मणान् भोजयित्वा पिता नाम करोति' (पा०गृ०सू० १|१७|१)  अर्थात् इसमें तीन बातें कही गईं – 

  1.  यह संस्कार दसवें दिन की रात्रि बीत जाने पर ग्यारहवें दिन किया जाता है। 
  2.  तीन ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है।  
  3.  शिशु का नामकरण उसका पिता करता है, यदि किसी कारण बच्चे का पिता न हो तो नामकरण संस्कार पितामह, चाचा अथवा आचार्य भी यह संस्कार कर सकते है।  

बालक के जन्म लेने के अनन्तर दस दिनों तक जननाशौच रहता है, अत: इस समय नामकरण संस्कार नहीं किया जाता है। अशौच की निवृत्ति के पश्चात् ही ग्यारहवें दिन यह संस्कार किया जाता है। व्यासस्मृति में कहा गया है कि “एकादशेऽह्नि नाम”। एवं यही बात शंखस्मृति में भी लिखी गई है- “अशौचे तु व्यतिक्रान्ते नामकर्म विधीयते “।'  

यदि किसी कारण नामकरण संस्कार ग्यारहवें दिन न हो सके तो क्या करें ? 

यदि किसी जातक का नामकरण संस्कार जन्म से ग्यारहवें दिन नहीं किया जा सके, तो इस स्थिति में  अठारहवें, उन्नीसवें, सौवें दिन अथवा एक अयन के बीत जाने पर शिशु का नामकरण संस्कार किया जा सकता है तथा अपने कुलाचार के अनुसार भी नामकरण संस्कार कर सकते हैं। 

नामकरण संस्कार कब निषिद्ध है ? 

ग्यारहवें दिन का समय बीत जाने के पश्चात् यदि बालक का नामकरण संस्कार कुल परम्परा या स्थानीय परम्परा के अनुसार किया जाता है, तो उसमें भी नामकरण का नियत समय होने पर भद्रा, वैधृति, व्यतिपात, ग्रहण, संक्रान्ति, अमावस्या और श्राद्ध के दिन शिशु का नामकरण निषिद्ध है।    

नाम की संरचना कैसी होनी चाहिए ?  

इसके विषय में पारस्करगृह्यसूत्र और स्मृतियों में विस्तार से लिखा गया है –  

पारस्करगृह्यसूत्र :- द्वयक्षरं चतुरक्षरं वा घोषवदाद्यन्तरन्तस्थम् । दीर्घाभिनिष्ठानं कृतं कुर्यान्न तद्धितम् ॥ अयुजाक्षरमाकारान्तः स्त्रियै तद्धितम् ॥' 

  • अर्थात्, बालक का जो नाम हो वह दो या चार अक्षर युक्त हो, पहला अक्षर घोषवर्ण युक्त हो (वर्ग का तीसरा, चौथा और पांचवां), मध्य में अन्त:स्थ वर्ण (य, र, ल, व आदि) एवं नाम का अंतिम वर्ण दीर्घ एवं कृदन्त हो, तद्धितान्त न हो।  
  • कन्या का नाम विषमवर्णी तीन या पांच अक्षरयुक्त, दीर्घ वर्णनान्त एवं तद्धितान्त होना चाहिए। 

वीरमित्रोदय में चार प्रकार के नाम का विधान किया गया है –  

  1. कुलदेवता से सम्बन्ध। 
  2. मास से सम्बन्ध। 
  3. नक्षत्र से सम्बन्ध। 
  4. व्यावहरिक नाम।  

धर्मसिंधु में चार प्रकार के नाम बतलाये गए हैं – 

  1. देवनाम:- रामदास, कृष्नानुज। 
  2. मास नाम:- वैकुण्ठ, जनार्दन, उपेन्द्र।  
  3. नक्षत्र नाम:- नक्षत्रों के नाम या स्वामियों के नाम से। 
  4. व्यावहारिक नाम:- (पुकारने का नाम)। 

वर्णानुसार नाम की व्यवस्था :- 

नामकरण संस्कार चारों वर्णों का किया जाता है एवं चारों वर्णों के लिए अलग- अलग नामों की व्यवस्था शास्त्रों ने की है। पारस्करगृह्यसूत्र एवं मनुस्मृति के अनुसार:-   

  • ब्राहमण का नाम मंगलदायक, आनन्दसूचक तथा शर्मायुक्त हो। 
  • क्षत्रिय का नाम बल, रक्षा, शासन क्षमता का सूचक तथा वर्मायुक्त हो। 
  • वैश्य का नाम धन- ऐश्वर्यसूचक, पुष्टियुक्त तथा गुप्तयुक्त होना चाहिए।  
  • शुद्र का नाम सेवा आदि गुणों से युक्त एवं दसान्त होना चाहिए।  

नामकरण संस्कार में जन्म राशि नाम और पुकार नाम की व्यवस्था :-  

शास्त्रों में किस कर्म को राशि नाम से करना चाहिए तथा किस कर्म को पुकार नाम से ग्रहण करना चाहिए इस विषय पर विचार करते हुए कहा गया है की विवाह में, मांगलिक कार्यों में, यात्रा के मुहूर्त आदि विचार में तथा ग्रह गोचर की गणना करने में जन्म राशि नाम का प्राधान्य होता है। इसी प्रकार देश, ग्राम, युद्ध, सेवा तथा व्यवहारिक कार्यों में नाम राशि की प्रधानता होती है। जैसा कि कहा गया है – 

“विवाहे सर्वमाङ्गल्ये यात्रायां ग्रहगोचरे। 

        जन्मराशिप्रधानत्वं नामराशिं न चिन्तयेत् ॥ 

 देशे ग्रामे गृहे युद्धे सेवायां व्यवहारके । 

           नामराशिप्रधानत्वं जन्मराशिं न चिन्तयेत्” ॥  

अतः हम यह कह सकते हैं कि नामकरण संस्कार की बहुत उपयोगिता है, क्योंकि जैसा नाम मनुष्य का  होता है उसी के अनुरूप ही उनके गुण होते हैं अतः बालक अथवा बालिका का नाम अत्यंत उदात्त भावना से परिपूर्ण होना चाहिए।  

नामकरण संस्कार में ग्राह्य तिथि, नक्षत्र एवं लग्न :-    

  • शुभ तिथियाँ :- प्रतिपदा (कृष्ण), द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, और त्रयोदशी (शुक्ल)। 
  • शुभ नक्षत्र :- अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और रेवती। 
  • शुभ लग्न :- 1, 4, 6, 7, 9, 12 ये लग्न शुभ ग्रह युत या दृष्ट हों।   

भारतीय सनातन प्रक्रिया में नाम की महिमा अत्यंत व्यापक बताई गयी है, इसलिए नामकरण संस्कार वैदिक परम्परा के माध्यम से ही सम्पादित कराना चाहिए। वैदिक परम्परा से नामकरण संस्कार कराने हेतु वैकुण्ठ की वेबसाइट vaikunth.co पर जाएं। जहां पर षोडश संस्कार, अनुष्ठान एवं यज्ञ समेत 110 से अधिक पूजा की बुकिंग कर सकते हैं।  

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