षडैश्वर्य एवं गो कृपा प्राप्ति हेतु करें सुरभी स्तोत्र पाठ

षडैश्वर्य एवं गो कृपा प्राप्ति हेतु करें सुरभी स्तोत्र पाठ

।। सुरभि स्तोत्रम् ।।

श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणके प्रकृतिखण्डमें महेन्द्रकृत यह स्तोत्र है । इस स्तोत्र का पाठ करने से धन,लक्ष्मी,वैभव एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । 

महेन्द्र उवाच

नमो देव्यै महादेव्यै सुरभ्यै च नमो नमः। 
गवां बीजस्वरूपायै नमस्ते जगदम्बिके ॥१॥ 

नमो राधाप्रियायै च पद्मांशायै नमो नमः। 
नमः कृष्णप्रियायै च गवां मात्रे नमो नम: ॥२॥

महेन्द्र बोले - देवी एवं महादेवी सुरभी को बार-बार नमस्कार है। जगदम्बिके ! तुम गौओं की बीजस्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम श्रीराधा को प्रिय हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम लक्ष्मी की अंशभूता हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है। श्रीकृष्णप्रिया को नमस्कार है। गौओं की माता को बार-बार नमस्कार है ।

कल्पवृक्षस्वरूपायै सर्वेषां सततं परम्।
श्रीदायै धनदायै च बुद्धिदायै नमो नमः ॥३॥

शुभदायै प्रसन्नायै गोप्रदायै नमो नमः। 
यशोदायै सौख्यदायै धर्मज्ञायै नमो नमः ॥४॥

जो सबके लिये कल्पवृक्षस्वरूपा तथा श्री, धन और बुद्धि प्रदान करने वाली हैं, उन भगवती सुरभी को बार-बार नमस्कार है। शुभदा, प्रसन्ना और गोप्रदायिनी सुरभीदेवी को बार-बार नमस्कार है। यश और सौख्य प्रदान करने वाली धर्मज्ञादेवी को बार-बार नमस्कार है । 

स्तोत्रस्मरणमात्रेण तुष्टा हृष्टा जगत्प्रसू: ।
आविर्बभूव तत्रैव ब्रह्मलोके सनातनी ॥५॥

महेन्द्राय वरं दत्त्वा वाञ्छितं सर्वदुर्लभम् । 
जगाम सा च गोलोकं ययुर्देवादयो गृहम् ॥६॥ 

इस प्रकार स्तुति सुनते ही सनातनी जगज्जननी भगवती सुरभी संतुष्ट और प्रसन्न हो उस ब्रह्मलोकमें ही प्रकट हो गयीं । देवराज इन्द्र को परम दुर्लभ मनोवांछित वर देकर वे पुनः गोलोक को चली गयीं, देवता भी अपने-अपने स्थानों को चले गये ।

बभूव विश्वं सहसा दुग्धपूर्णं च नारद । 
दुग्धाद्धृतं ततो यज्ञस्ततःप्रीतिः सुरस्य च ॥७॥ 

नारद ! फिर तो सारा विश्व सहसा दूधसे परिपूर्ण हो गया। दूधसे घृत बना और घृतसे यज्ञ सम्पन्न होने लगे तथा उनसे देवता संतुष्ट हुए ।

इदं स्तोत्रं महापुण्यं भक्तियुक्तश्च यः पठेत्। 
स गोमान् धनवांश्चैव कीर्तिवान् पुण्यवान् भवेत् ॥८॥ 

सुस्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । 
इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते कृष्णमन्दिरम् ॥९॥ 

उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करने तथा अखिल यज्ञोंमें दीक्षित होनेका फल सुलभ होगा। ऐसा पुरुष इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके धाममें चला जाता है ।

सुचिरं निवसेत्तत्र कुरुते कृष्णसेवनम् । 
न पुनर्भवनं तस्य ब्रह्मपुत्र भवे भवेत् ॥ १० ॥ 

चिरकालतक वहाँ रहकर भगवान्‌की सेवा करता रहता है। हे ब्रह्मपुत्र नारद ! उसे पुनः इस संसारमें नहीं आना पड़ता ।

॥ इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणके प्रकृतिखण्डमें महेन्द्रकृत सुरभिस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥

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