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Kaal-sarp

कालसर्प दोष एवं निवारण

दोष एवं निवारण | Duration : 4 Hours 45 minute
Price : 11000

About Puja

प्राचीन धर्मग्रन्थों एवं सद्‌शास्त्रों में यह दोष दृष्टिगोचर होता है। सनातन संस्कृति एवं सभ्यता में सर्प पूजन की परम्परा पुरातन है। नागपञ्चमी नामक उत्सव सम्पूर्ण राष्ट्र में विधि-विधान से सम्पन्न किया जाता है। सभी लोग अभिमन्त्रित गोबर से नागदेवता की आकृति बनाते हैं तथा पूजा करते हैं।
ज्योतिषशास्त्र में प्रत्येक दिन का नाम ग्रहों के नाम पर रखा गया है। किन्तु राहु एवं केतु ये दोनों छायाग्रह हैं, राहु का स्वभाव शनि के तरह तथा केतु मङ्गलवत् होता है। एक ही शरीर का दो भाग होने के कारण राहु सिर एवं केतु धड़ हो गया । सिर में विचार शक्ति होती है, लेकिन धड़ के अभाव में निष्क्रिय होता है। राहु जिस भाव में होता है या जहाँ दृष्टि डालता है उस राशि एवं भाव में स्थित ग्रह को अपने विचार से प्रभावित कर, क्रिया के लिए प्रेरित करता है। केतु मंगल के सदृश विध्वंसकारी होता है तथा अपनी महादशा एवं अन्तर्दशा में बुद्धि को भ्रमितकर सुख समृद्धि का नाश करता है। राहु की महादशा बाधा पहुंचाती है। राहु,अपने सम्बन्धित ग्रह के द्वारा अपना प्रभाव दिखाता है एवं केतु सम्बन्धित ग्रह के प्रभाव में आकर उस ग्रह के अनुसार कार्य करता है। राहु जिस ग्रह के सम्पर्क में होता है उसके अंश राहु से कम होने पर राहु प्रभावी रहेगा, जबकि राहु के अंश कम होने पर उस ग्रह का प्रभाव अधिक होगा एवं राहु तेजहीन हो जायेगा।
कालसर्प राहु से केतु एवं केतु से राहु की ओर बनता है तथा जब राहु से केतु की ओर बढ़ता है तभी यह प्रभावी होता है, अन्यथा केतु से राहु की ओर निष्प्रभावी होता है। 
 कुण्डली में काल सर्प दोष का  निर्माण किसी पूर्वजन्म कृत-दोष अथवा पितृदोष के कारण बनता है।

कालसर्प योग से भयभीत नहीं होना चाहिए,यह हमेशा कष्टकारक ही नहीं बल्कि  लाभप्रद भी होते हैं। अनेक शुभ योग यथा- पंचमहापुरुष योग, बुधादित्य योग आदि सुयोग बनाते हैं, जिसके कारण यह दोष अल्पकालिक होता है। 

यदि किसी जातक के कुण्डली में कालसर्प दोष है, तो परिवार के अन्य लोगों के भी जन्माङ्क  में भी यह योग देखने को मिलेगा, क्योंकि यह अनुबन्धित ऋण है, जो हमें पूर्वजों से मिलता है तथा परिवार के सभी सदस्य किसी न किसी रूप से प्रभावित होते हैं, इसी को  पितृदोष नाम से भी जाना जाता है। 
कालसर्प दोष से डरना नहीं चाहिए, इस समस्या का एक आसान समाधान है जिसे विधिपूर्वक वैदिक विद्वान् से कालसर्प दोष शान्ति कराना  चाहिए।

कालसर्प योग के प्रकार-  राशियों के आधार पर द्वादश लग्न होते हैं तथा विविध योगों के आधार पर 288 प्रकार के कालसर्प योग बन सकते हैं। प्रमुख रुप से ये द्वादश हैं।

कालसर्प योग के प्रकार-  राशियों के आधार पर द्वादश लग्न होते हैं तथा विविध योगों के आधार पर 288 प्रकार के कालसर्प योग बन सकते हैं। प्रमुख रुप से ये द्वादश हैं।

1.अनन्त काल सर्पयोग :- लग्न से सप्तम भाव तक बनने वाले योग को अनन्तकाल सर्पयोग कहते हैं। इसके कारण जातक को अस्थिरता, अशान्ति, सम्मान की हानि, वैवाहिक जीवन में अशान्ति आदि दृष्टिगत् होता है, मानसिक क्लेश निरन्तर दिखाई देता है। इसकी शान्ति के लिए विशेषतः अनन्त नाग की पूजा होती है।

 2. कुलिक कालसर्प योग:- द्वितीय से अष्टम तक इसका प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण जातक का स्वास्थ्य प्रभावित रहता है, धन के लिए  संघर्ष करना पड़ता है, वाणी में मधुरता नही रहती जिससे वाद विवाद बना रहता है, परिवार से विरोध रहता है तथा किसी भी कार्य का यश नहीं मिलता, विवाह में बाधा आती है तथा विच्छेद की भी समस्या हो सकती है।

3. वासुकि कालसर्पयोग:- यह तृतीय से नवम् तक बनता है। पारिवारिक विरोध, सामाजिक समस्याएँ,अपनों से धोखा, प्रतिकूलभाग्य,आर्थिक समस्या, व्यवसाय में प्रतिकूलता, विभिन्न प्रकार की बाधाएँ, धर्म में नास्तिकता की भावना, वाद विवाद में कानूनी बाधा आदि दिखायी देता है। पद, यश और प्रतिष्ठा आदि के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

4. शंखपाल कालसर्प योग :- यह चतुर्थ से दशम भाव में निर्मित होता है। इसके कारण व्यवसाय, नौकरी तथा शिक्षा में व्यवधान उत्पन्न होता है। व्यवसाय तथा कार्यों में हानि होती है। वाहन तथा कर्मचारियों से सम्बन्धित समस्याएं आती हैं। धन की हानि होती है, परिस्थितियाँ प्रतिकूल होती है।

5.पद्म कालसर्प दोष:- पञ्चम से एकादश भाव में राहु तथा केतु होने से इस योग का निर्माण होता है। इसके प्रभाव से सन्तान से दुःखी, पुत्र का दूर रहना, विच्छेद, असाध्य रोगों की समस्या, दुर्घटना की सम्भावना पत्नी तथा मित्रों द्वारा विश्वासघात, सट्टा, जुआ आदि का लत, अपनों द्वारा विश्वासघात तथा पूरा जीवन संघर्षपूर्ण होता है। 

6.महापद्‌म कालसर्प योग :- छठवें  से बारहवें भाव के योग में यह दोष बनता है। चरित्र हीनता, पत्नी से विछोह, शत्रुओं से पराभव, आत्मबल की कमी आदि दोष होते हैं, शत्रु निरन्तर षडयन्त्र करते हैं।

7.तक्षक कालसर्प योग:-  सप्तम् से लग्न तक यह प्रभावित करता है, वैवाहिक जीवन में बाधा उत्पन्न करता है। शत्रुपक्ष बलवान होते हैं, पदोन्नति में अवरोध तथा विभिन्न समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

8.कर्कोटक कालसर्प योग:- अष्टम भाव से द्वितीय भाव तक कर्कोटक योग होता है। विभिन्न प्रकार के रोग दुर्घटना तथा प्रेत बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। धन की हानि, व्यापार की अवनति, नौकरी में बाधा, मित्रों से हानि, रोगों का प्रकोप, अकाल मृत्यु आदि का योग  बनता है।

9.शखनाद या शंखचूड कालसर्प योग:- यह योग नवम्  से तृतीय भाव तक बनता है। भाग्यहीनता का  पोषक, व्यापार में हानि, परिवार में कलह, कार्यों में अवरोध आदि समस्यायें उत्पन्न होती है।

10.पातक कालसर्प योग:- दशम् से  चतुर्थ भाव तक यह  योग माना जाता है। दशम् एवं चतुर्थ से माता पिता के विषय का ज्ञान तथा दादा दादी का वियोग की भी सम्भावना बनती है।

11.विषधर कालसर्पयोग :-  राहु तथा केतु यदि एकादश या पंचम में हों तो यह योग बनता है, जिसके कारण हृदय रोग, अनिद्रा, प्रिय से विछोह आदि परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, असाध्य रोग की सम्भावना होती है।

12.शेषनाग कालसर्पयोग :- द्वादश से षष्ठभाव तक यह निर्माण होता है, शत्रुओं  की अधिकता होती है मानसम्मान, प्रतिष्ठा, धन आदि की हानि होती है, आंखो  का आप्रेशन आदि होने की सम्भावना अधिकतर रहती है।

काल सर्प योग के लक्षण

  • प्रायः स्वप्न में अधिकर सर्प दिखाई देना।
  • परिश्रम के बाद भी समुचित फल की प्राप्ति न होना।
  • मानसिक तथा आर्थिक संकटों से ग्रसित रहना । 
  • उचित निर्णय लेने में असमर्थ रहना ।
  • अकारण  लोगों से शत्रुता होना तथा कार्य में अवरोध आना।
  • परिवार में कलह की स्थिति बनना ।
  • विवाह में विलम्ब तथा वैवाहिक जीवन में तनाव आना।
  • कालसर्प दोष के कारण शारीरिक, मानसिक, राजनैतिक आध्यात्मिक, आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में क्षति  होती है।

कालसर्प दोष निवारण स्थान :- कालसर्प दोष शान्ति, किसी भी पवित्र जलाशय, संगम, नदी तट, शिवमन्दिर अथवा नागदेवता  के मन्दिर में ही करनी चाहिए । कालसर्प की  शान्ति  घर में नही करानी चाहिए। इसके लिए कुछ सर्वोत्तम स्थान है-
1. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग नासिक
2. महाकाल मन्दिर उज्जैन
3. नाग मन्दिर ग्वारीघाट, जबलपुर
4. सिद्धशक्तिपीठ कालीपीठ  कलकत्ता
5. प्रयागराज संगम अथवा वासुकिनाग मन्दिर
6. त्रियुगी  नारायण मन्दिर केदारनाथ
7. गरुण गोविन्द छटीकरा वृन्दावन।।

* इन पवित्र स्थलों पर कालसर्प दोष निवारण पूजा सर्वोत्तम विधि से वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा सम्पन्न कराया जा सकता है।

Benefits

कालसर्प दोष एवं निवारण का  माहात्म्य:-

  • काल सर्प दोष निवारण से कुण्डली मे जो शुभ ग्रह है वह पूर्ण रूप से आगे बढ़ने में मदद करते है तथा जातक के जीवन में किसी प्रकार की समस्या नहीं आती'
  • कालसर्प दोष निवारण पूजा कराने से पारिवारिक जीवन में  प्रसन्नता,आरोग्यता,धन एवं यश की प्राप्ति होती है

कालसर्प योग शान्ति के सामान्य उपाय=

  • रुद्राभिषेक श्रावणमास में निश्चित कराएं, अथवा अन्य  महीनों में शिववास के अनुसार करावे ।
  • चाँदी के नाग नागिन के जोड़े को विधिवत् पूजन करके जल में प्रवाहित करें। 
  • इस दोष की शान्ति के लिए सर्प मन्त्र से हवन करें।
  • शिवलिङ्ग का मिश्री एवं दूध से अभिषेक करें।
  • पंचाक्षर मंत्र का जप तथा प्रवाहित जल में कोयला अर्पण करें।
  • सेवकों को मसूर की दाल दान करें।
  • नवनाग स्तोत्र का पाठ करें एवं शिव पंचाक्षर स्तोत्र का नियमित पाठ करें।

कालसर्प दोष निवारण न कराने से हानि

  • किसी जातक की कुण्डली में यदि कालसर्प है, तो उस व्यक्ति के जीवन में कुछ भी अच्छा नहीं होता है, उसके जीवन में हर प्रकार की बाधा, व्यवसाय मे हानि स्वप्न में सर्प दिखाई देना, अचानक नींद से जागकर चिन्तातुर मुद्रा में सोचना, रात भर परेशान रहना तथा जीवन सारहीन हो जाता है। 
  • व्यक्ति का कर्जदार बन जाना, सामाजिक प्रतिष्ठा का हनन होना, अपनी इच्छा अनुसार किसी कार्य का ना होना, कभी -कभी तो व्यक्ति अपने जीवन को ही समाप्त करने की कोशिश करता है,या अचानक दुर्घटना इत्यादि  की सम्भावना बढ़  जाती है ।
Process

कालसर्प दोष एवं निवारण   में  होने वाले प्रयोग या विधि-

  1. स्वस्तिवाचन एवं शान्तिपाठ
  2. प्रतिज्ञा सङ्कल्प
  3. गणपति गौरी पूजन
  4. कलश स्थापन एवं वरुणादि देवताओं का पूजन
  5. पुण्याहवाचन एवं मन्त्रोच्चारण अभिषेक
  6. षोडशमातृका पूजन
  7. सप्तघृतमातृका पूजन
  8. आयुष्यमन्त्रपाठ
  9. सांकल्पिक नान्दीमुखश्राद्ध (आभ्युदयिकश्राद्ध)
  10. नवग्रह मण्डल पूजन
  11. अधिदेवता, प्रत्यधिदेवता आवाहन एवं पूजन
  12. पञ्चलोकपाल,दशदिक्पाल, वास्तु पुरुष आवाहन एवं  पूजन 
  13. रक्षाविधान आदि
  14. पंचभूसंस्कार
  15. अग्नि स्थापन
  16. ब्रह्मा वरण 
  17. कुशकण्डिका
  18. आधार-आज्यभागसंज्ञक हवन
  19. घृताहुति
  20. मूलमन्त्र आहुति 
  21.  चरुहोम
  22. भूरादि नौ आहुति
  23.  स्विष्टकृत आहुति
  24. पवित्रप्रतिपत्ति
  25. संस्रवप्राशन 
  26. मार्जन
  27. पूर्णपात्र दान
  28. प्रणीता विमोक
  29. मार्जन 
  30. बर्हिहोम 
  31. पूर्णाहुति, आरती  भोग, विसर्जन  आदि
Puja Samagri

वैकुण्ठ के द्वारा दी जाने वाली पूजन  सामग्री:-

  • रोली, कलावा    
  • सिन्दूर, लवङ्ग 
  • इलाइची, सुपारी 
  • हल्दी, अबीर 
  • गुलाल, अभ्रक 
  • गङ्गाजल, गुलाबजल 
  • इत्र, शहद 
  • धूपबत्ती,रुईबत्ती, रुई 
  • यज्ञोपवीत, पीला सरसों 
  • देशी घी, कपूर 
  • माचिस, जौ 
  • दोना बड़ा साइज,पञ्चमेवा 
  • सफेद चन्दन, लाल चन्दन 
  • अष्टगन्ध चन्दन, गरी गोला 
  • चावल(छोटा वाला), दीपक मिट्टी का 
  • पानी वाला नारियल, सप्तमृत्तिका 
  • सप्तधान्य, सर्वोषधि 
  • पञ्चरत्न, मिश्री 
  • पीला कपड़ा सूती, तांबा या पीतल का कलश ढक्कन सहित  
  • पंचगव्य गोघृत, गोमूत्र

हवन सामग्री एवं यज्ञपात्र :-

  • काला तिल 
  • जौ,चावल 
  •  कमलगट्टा, पंचमेवा 
  •  हवन सामग्री, घी,गुग्गुल
  • गुड़ (बूरा या शक्कर) ,गड़ी गोला 
  •  पान पत्ता, बलिदान हेतु पापड़
  • काला उडद 
  • पूर्णपात्र -कटोरी या भगोनी
  • प्रोक्षणी, प्रणीता, स्रुवा, शुचि, स्फय - एक सेट
  • हवन कुण्ड ताम्र का 10/10  इंच या 12/12 इंच 
  • कलश रखने के लिए मिट्टी का पात्र
  •  पिसा हुआ चन्दन 
  • नवग्रह समिधा
  •  हवन समिधा 
  •  घृत पात्र
  • कुशा
  • पंच पात्र

यजमान के द्वारा की जाने वाली व्यवस्था:-

  • वेदी निर्माण के लिए चौकी 2/2 का - 1
  • गाय का दूध - 100ML
  • दही - 50ML
  • मिष्ठान्न आवश्यकतानुसार 
  • फल विभिन्न प्रकार ( आवश्यकतानुसार )
  • दूर्वादल (घास ) - 1मुठ 
  • पान का पत्ता - 11
  • पुष्प विभिन्न प्रकार - 2 kg
  • पुष्पमाला - 7 ( विभिन्न प्रकार का)
  • आम का पल्लव - 2
  • विल्वपत्र - 21
  • तुलसी पत्र -7
  • शमी पत्र एवं पुष्प 
  •  थाली - 2 , कटोरी - 5 ,लोटा - 2 , चम्मच - 2 आदि 
  • अखण्ड दीपक -1
  • देवताओं के लिए वस्त्र -  गमछा , धोती  आदि 
  • बैठने हेतु दरी,चादर,आसन 
  • गोदुग्ध,गोदधि,गोबर

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